डाकियाअब कहाँ हैं वो डाकिये वाले दिन .... घण्टों इंतजार रहता था....टकटकी बन्धी रहती थी देहरी पर..जरा सी आहट पर कदम चल पड़ते थे...धडकनों का संगीत सुनाई देने लगता था... गालों पर बेमौसम गुलाल बिखर जाया करता था....नजरों का काजल अधखिला कमल हो जाया करता था... हर काम बेमानी लगता था उस इंतजार में.... सच... डाकिये का इंतजार बड़ा ही रूमानी लगता था... कहाँ गए वो डाकिये वाले दिन..
मंगलवार, 19 अप्रैल 2022
बुधवार, 2 मार्च 2022
ये स्त्री
ये स्त्री है जनाब...
बिखर बिखर कर निखरती है...
टूट टूट कर सबको जोड़ती है...
मुँह में पल्लू का कोना ठूसे...
मौन आँखों से बोलती है...
ये स्त्री है जनाब...
पीड़ा में भी मुस्कुराती है
मौन हर दंश झेलती पर ...
अपने चीत्कार को खुद ही सुनती
कोरों की नमी में भी मुस्कुराती
ये स्त्री है जनाब....
ये वो नेह का धागा है
जो पिरोती रिश्तों को
कैसे कह दूँ साहब
ये कोमल सी छुई मुई
नार नवेली कमतर है किसी से...
तभी तो कहा....
ये स्त्री है जनाब....
मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022
उलझन
ए सुनो....
बस एक बार मिल लो ...
बहुत कुछ उलझा है तुम संग...
वही उलझन सुलझा लें..
बहुत सी खट्टी मीठी यादें...
बहुत सी अच्छी बुरी बातें...
बहुत से मान मनुहार के पल...
वो तुम्हारा आँखों से बोलना...
वो तुम्हारे मेरी हर बात को हल्के से उछलना...
वो तुम्हारा लटों को अपने हाथ से पीछे करना...
वो पीछे से आकर आँखें बन्द करना...
वो अभी मन भरा नहीं कहकर रोकना...
जाते जाते मुड़कर तुम्हारा देखना...
और
वो आखिरी बार तुम्हारा बिना मुड़े चले जाना ...
बहुत सी बातें हैं... तुम आओ तो तुम
बस एक बार तुमसे उलझना है
उलझ कर तुमझे बहुत कुछ सुलझाना है....
समझ रहे हो ...ना तुम
सब कुछ सुलझाने के लिए...
जरूरी है तुमसे उलझना...
# डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"
गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022
प्रेम
प्रेम
प्रेम अनन्त है
वही प्रेम सूक्ष्म है
प्रेम धरा है
तो वही प्रेम आकाश है
प्रेम प्रतीक्षा है...
प्रेम कोरो की नमी तो....
वहीं प्रेम स्निग्ध मुस्कान है..
ओस की बूँदों सा
सूर्य की पहली किरन सा प्रेम
सच अपरिभाषित सा प्रेम....
जरूरत कहाँ है... प्रेम को शब्द की
किसी अभिव्यक्ति की .....
प्रेम अनन्त विस्तार है
कहाँ है प्रेम की सीमा .....
प्रेम अंतर्मन का अनन्त अहसास
जिसे पढ़ा नही जाता
शब्दों के मोती में गूँथ कर
माला नहीं बनाई जा सकती
व्यक्त नहीं किया जाता
शब्दों की परिधि से परे प्रेम
एक अनगढ़ सा अहसास प्रेम
बन्द आँखों में सिमटा प्रेम
रूह से रूह में समाया हुआ
अव्यक्त सा... प्रेम
मेरा ही प्रेम है...
और
मैं प्रेममय प्रेमी हूँ....
डॉ नीलम गुप्ता " नीरा"
वो मेरी गुड़िया
दास्ताँ -ए- जिन्दगी
Happy taddy Day
Dear Friends....चलिए जमाने के साथ कदमताल मिलाकर अंग्रेजियत के साथ आगे बढ़ते हुए मनाते हैं टेडी डे....
पर एक बात बताऊँ ...
कितने भी महंगे टेडी ले लो पर जो आनन्द खुशी माँ के हाथ की बनी कपड़े की गुड़िया में मिलती थी वो कहीं नही मिलती ....
याद है ना वो सूट के बचे कपड़े की गुड़िया
काले बटन से आँखे, लाल धागे से होठ, और स्वेटर के बचे ऊन से उसके बाल....और उसकी लम्बी सी चोटी...
सच कहूँ तो बहुत याद आती है वो गुड़िया
छुट्टी बाले दिन ...
हम बच्चों की टोली में बंट जाना
और गुड़िया गुड्डे का व्याह रचाना
कुछ मांग कर और कुछ अपने हिस्से से छिपा कर
बिस्कुट और नमकीन की दावत करना ....
पता नहीं कितने ही किस्से...
सच कहती हूं.....
देख कर गुड़िया को आज भी खो जाती हूँ बचपन में
ये आज के टेडी रंग बिरंगे नरम से बहुत सुन्दर हैं ....
मन को लुभाते भी बहुत हैं ....
पर...
माँ के हाथ की नये पुराने कपड़ों से बनी ....
ऊन के लम्बे बालों वाली ...
बड़ी बड़ी कजरारी आँखों वाली ....
वो गुड़िया ....
आज के मंहगे टेडी पर रौब जमाती है....
टिकता नहीं टेडी उस भोली भाली मासूम सी दिलकश " गुड़िया " के आगे....
बुधवार, 9 फ़रवरी 2022
तुम्हारा ख्याल
सुनो....
खोजती सी इन आँखो में ..…
ख्याब कुछ पुराने हैं...
पर.... ख्याल
आज भी तुम्हारे नए हैं..
वो सुबह की पहली किरन सा तुम्हारा चेहरा...
वो सर्द दोपहरी धूप सा कुनकुना अहसास तुम्हारा..
वो ढलती शाम सा तुम्हारा नजरें झुका कर मध्यम से चले जाना...
वो चाँदनी रात सा तुम्हारा जुल्फों को झटक कर हौले से मुस्कुराना....
है कहाँ पुराना वो तुम्हारा ख्याल ....
वो तो आज भी नया सा है....
फर्क
फर्क होता है ....
दोस्ती और प्रेम में
प्रेम कितना भी प्रगाढ़ हो ....एक मुकाम पर ठहर सा जाता है ...चाहता होती है कुछ नया पाने की ...और वो नयापन ही प्रेम को फीका कर देता है..… प्रेम के वास्तविक रूप को कुरूप कर देता है.... रंग से रंगीन हो जाता है ....वो सुकुमार "प्रेम"
पर वहीं दोस्ती...
दोस्ती का कोई मुकाम नहीं होता कोई चाहत नहीं होती बिलकुल स्वच्छंद.... जितने पायदान चढ़ो ..उतनी ही गहरी ...हर रोज नई ऊर्जा से लबरेज ....बस निर्बाध निर्मल नदी सी आगे बढ़ती जाती है... कभी ठहरती नहीं... थमती नहीं... यही तो है मस्तीभरी मदमस्त करने वाली "दोस्ती "
सच कहूँ...
जिंदगी के सफर में प्रेमी तो बहुत मिलेंगे... हर
मोड़ पर साथ चलने का वादा करने वाले ...हमसफर बनने का वादा करके बीच मझदार में साथ छोड़ने वाले..
पर दोस्त बहुत कम...और जो भी दोस्त मिले कस कर थाम लेना उसका हाथ...दोस्त तो होते ही वो है जो कदमों को डगमगाने नहीं देते और डगमगाए कदम तो थाम लेते हैं ...गुजारिश इतनी ही है... साथ खुद भी ना छोड़ना ऐसे दोस्त का....
दोस्त मतलब....दो हस्तियों के मिलन ही दोस्त है... और दोस्तों से ही जन्नत है... जहाँ दोस्तों की महफ़िल जमती है... वहाँ सच में जन्नत ही तो होती है ☺️☺️
#डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"
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