फर्क होता है ....
दोस्ती और प्रेम में
प्रेम कितना भी प्रगाढ़ हो ....एक मुकाम पर ठहर सा जाता है ...चाहता होती है कुछ नया पाने की ...और वो नयापन ही प्रेम को फीका कर देता है..… प्रेम के वास्तविक रूप को कुरूप कर देता है.... रंग से रंगीन हो जाता है ....वो सुकुमार "प्रेम"
पर वहीं दोस्ती...
दोस्ती का कोई मुकाम नहीं होता कोई चाहत नहीं होती बिलकुल स्वच्छंद.... जितने पायदान चढ़ो ..उतनी ही गहरी ...हर रोज नई ऊर्जा से लबरेज ....बस निर्बाध निर्मल नदी सी आगे बढ़ती जाती है... कभी ठहरती नहीं... थमती नहीं... यही तो है मस्तीभरी मदमस्त करने वाली "दोस्ती "
सच कहूँ...
जिंदगी के सफर में प्रेमी तो बहुत मिलेंगे... हर
मोड़ पर साथ चलने का वादा करने वाले ...हमसफर बनने का वादा करके बीच मझदार में साथ छोड़ने वाले..
पर दोस्त बहुत कम...और जो भी दोस्त मिले कस कर थाम लेना उसका हाथ...दोस्त तो होते ही वो है जो कदमों को डगमगाने नहीं देते और डगमगाए कदम तो थाम लेते हैं ...गुजारिश इतनी ही है... साथ खुद भी ना छोड़ना ऐसे दोस्त का....
दोस्त मतलब....दो हस्तियों के मिलन ही दोस्त है... और दोस्तों से ही जन्नत है... जहाँ दोस्तों की महफ़िल जमती है... वहाँ सच में जन्नत ही तो होती है ☺️☺️
#डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"
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