गुरुवार, 15 जुलाई 2021

कहानी की कहानी

हाँ शौक है मुझे लिखने का...और वो भी कहानियाँ...जब भी  सोचता हूँ किसी नयी कहानी के बारे में ..हर कहानी के अंदर से एक कहानी निकल जाती है.. उस कहानी में उलझी रहती है ढेरों कहानियाँ... और सब लिपटी रहती है आपस में एक दूसरे से गुँथी सी....
सच कहूँ तो कहानियों का संसार देख मैं स्वंय उलझ जाता हूँ... मुझे लगता है कि मै स्वंय एक कहानी हो गया हूँ .सच ही तो है... मैं भी एक कहानी जैसा ही हूँ... और मुझे जुड़ी है छोटी छोटी हजारों कहानियाँ... शायद तभी मैं कहानी लिखता हूँ....
कहानियाँ कुछ अच्छी और कुछ  बुरी.. कुछ डरावनी तो कुछ ऐसी कि लगता है कहानी सच ही है...पर एक बात तो है इन कहानियों का संसार कितना भी बड़ा हो पर  सब में इतना जुड़ाव होता है कि हर कहानी अपने अंदर एक सीख ,एक उद्देश्य लिए रखती है.... हर कहानी का एक बजूद होता है...
बस तभी तो जुड़ाव है मेरा कहानियों से...और जब भी थोड़ा वक्त मिलता है.... मैं लिखने बैठ जाता हूँ ...कहानी.खो जाता हूँ एक नयी कहानियों की दुनिया में....

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

प्रेम

प्रेम

यह प्रेम... अनुबंध है अलिखित,मौन सा
निर्झर अश्रुओं का बहता हुआ
सहज सुख सा

समर्पण है सात्विक निर्मल जल सा... 
चिंतन वंदन है प्रभु के जैसा 

प्रेम विश्वास है अहसास है परम् सत्य
अटल है... वट ...जैसा

अभिनंदन है विरह सुख के जैसा ...
अबोध क्रदन है .. वियोग का... 

ना दिखा हो कदाचित् तुम्हें....
 परंतु 
चित्त में तो तुम्हारे भी छोड़ गया होगा
मेरा प्रेम अपना अंश... दो बूँद अमिय सा...

रविवार, 11 जुलाई 2021

वो फूल..

वो फूल जो  किताबों में रखे जाते हैं 
वो कभी सूखते नहीं हैं...
 समेटे रखते हैं अपने अंदर यादों की नमी को
तभी तो जब भी देखो ताजगी से लबरेज मिलते हैं
  मयस्सर नही उनको किसी का साथ
फिर भी यादों की गठरी खुद ही ढोते हैं...
ना जाने कितने अल्हड़  पलों को अपने अंदर 
खामोशी से दबाए किताबों में बंद पड़े हैं...
पर फिर भी...
अपनी भीनी सी महक से सरोबार आज भी करते हैं
यही तो वो फूल हैं...जो किताबों में बंद हैं
जब भी फुर्सत में पलटी जाती हैं  वो किताबें
 आँखों में कोरों में चमकने लगती हैं वो 
मोती सी ओस की बूंदें...
तभी तो...जब भी खोलो किताबें...
वो उनमें रखे वो फूल सूखते नही...

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"



बुधवार, 7 जुलाई 2021

मैं और मेरे बाबा

 जब आँखे खोली दुनिया मैं
तब बंद थीं मेरी आँखें
बाबा ने उठाया अपनी बाहों में
और बोले मन ही मन 
मैं हूँ साथ तुम्हारे पर जरा रखना सम्भल कर कदम
तब खोली आँखे मैंने देखा बाबा को...
उम्मीद से मुस्कुराते हुए...
कुछ बड़ी हुई लड़खड़ाते से कदम थामे उंगली बाबा की
बड़ी आगे...
तब बाबा बोले ..हौले से सम्भल कर रखना कदम

 कुछ बड़ी हुई जाना आस पास को
समझ तो आयी और नादानी और चंचल मन 
लेने लगा हिलोरें... उड़ने लगी मैं पंख लगा
तब बाबा बोले..कुछ हिदायत से...सम्भल कर रखना कदम

धीरे धीरे वक्त बदला
मैंने रखा कदम सपनों की रंगीन दुनिया में
भाने लगी मुझे चकाचौंध 
तितलियों के शहर की तितली मैं भी चाहती थी बनना
उड़ान भरने को आतुर मन संभालूं कैसे मन
ज्यूँ ही लड़खड़ाने लगे कदम
मूक दर्शक बने बाबा बोले...
सुन बिटिया...ये तिलिस्म का शहर है
जरा सम्भल कर रखना कदम
बाबा की हर हिदायत पर चाहे अनचाहे 
मैं बढ़ती गयी..कही खुद को मारा कहीं खुद मरी
पर बाबा की बात ना गिरने दी ना टाली
बस चलती रही सम्भल कर...

वक्त में फिर फेर बदल किया...
बाबा ने टटोला मेरा मन 
पर मैं तो बाबा के उसूलों पर चली
कैसे भटकती राह सम्भल जो थे मेरे बाबा

उम्मीद और आशाओं का दामन थामे 
नम आँखों से निहारते मुझको 
बिन बोले वो सब कुछ बोल
 थमा दिया मेरा हाथ उन अनजाने हाथों में
जहाँ थी हर घड़ी मेरी परीक्षा मुझे खुद ही था सम्भलना
वहाँ बाबा तो नहीं थे पर...फिर भी बाबा साथ थे
जहाँ लगी मैं डगमगाने वहीं याद आती बाबा की...जरा सम्भल कर चलना बिटिया ये दुनिया बड़ी संग दिल है...

आज बरसों बाद...
बाबा तो नही रहे..यही शाश्वत नियम है...
बाबा की जगह मैं खुद खड़ी हूँ..
पर फिर भी बाबा की अनुगूंज मेरे अंतर्मन में
गूंजती है... जरा सम्भल कर चलना बिटिया 

सोचती हूँ...आज कितना सुहाना संगम था
हिदायतों का उम्मीदों से भरा 
मैं और मेरे बाबा का
डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"


जिन्दा सवाल

जी हाँ जिन्दा सवाल 
आप भी सोच रहे होंगे...ये भी क्या सवाल तो सवाल है इसमें जिन्दा वाली क्या बात है... बिलकुल सही... 
हमारी जिन्दगी दिन प्रतिदिन अनेकों सवाल का सामना करती है अगर मैं ये कहूँ सुबह से लेकर शाम तक ना जाने कितने ही सवालों से रूबरू होते हैं...सवाल ही हैं जो हमें बहुत कुछ सिखाते हैं... जूझना.. उलझना और फिर सुलझना...
इसके साथ ही सवाल ही हैं जो हमारे साथ जुड़े रहते हैं... यहाँ तक तो बात साधरण सी है ये तो रोजमर्रा की अगर कहूँ छोटी सी बात है तो ...चलेगा  एक बात और सवाल है तो उसका जबाब भी होता है... हाँ हर सवाल का जबाब होता है...यहाँ तक की हर सवाल अपने साथ जबाब लेकर ही पैदा होता है....
तो चलिए आगे बढ़ते हैं.... कि ये जिन्दा सवाल कहाँ से आया....बताती हूँ... सवालों से जूझते हैं उभरते हैं... और बढ़ जाते हैं आगे....पर कभी कभी कोई ऐसा सवाल ...जिसका प्रतिउत्तर तो हम जानते हैं और देना भी चाहते हैं... पर हम दे नहीं पाते ..जिसके लिए हम लड़ते हैं ...किसी और से नहीं बल्कि  स्वंय से....और  वो सवाल हमारे जेहन में इतनी अंदर तक पैठ कर जाता है कि ....हम बार बार ना जूझते हैं उस सवाल से.... हर बार वो सवाल कौंधता है हमारे दिलोदिमाग में.... मथ देता है वो हमें...
पर हमारी कहीं ना कहीं कोई विवशता रहती है... जब हम सुलझ कर भी उलझ जाते हैं... और वो जिंदा से सवाल हमें अंदर तलक कुरेदता रहता है... एक टीस सी उभरता है... हर पल जब भी हमारा ध्यान जाता है... बस यही है उलझा सा सुलझा पर स्वंय में ही फंसा हुआ वो सवाल...जो जिंदा है...जो कुलबुलाता रहता है हमारे अंदर...
अच्छा एक बार विचार करिये...
डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

शनिवार, 3 जुलाई 2021

एक बार सोचो

अभी मैं अपने फ़ोन से कुछ images को delete कर रही थी तो फोन ने पूछा "Are u sure"?मैं अचरज में पड़ गई कि एक मशीन भी अपने अंदर स्टोर रहे फ़ोटो के रिश्तो को मिटाने के लिये Confirmation ले रही है,तो इस मशीन को चलाने वाला इंसान आखिर इतना लापरवाह कैसे हो सकता है?जो रिश्तो को तोड़ने या संबंधों से मुंह फेरने से पहले उसका दिल एक बार भी न पूछे कि Are u sure?