प्रेम
यह प्रेम... अनुबंध है अलिखित,मौन सा
निर्झर अश्रुओं का बहता हुआ
सहज सुख सा
समर्पण है सात्विक निर्मल जल सा...
चिंतन वंदन है प्रभु के जैसा
प्रेम विश्वास है अहसास है परम् सत्य
अटल है... वट ...जैसा
अबोध क्रदन है .. वियोग का...
ना दिखा हो कदाचित् तुम्हें....
परंतु
चित्त में तो तुम्हारे भी छोड़ गया होगा
मेरा प्रेम अपना अंश... दो बूँद अमिय सा...
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