बुधवार, 7 जुलाई 2021

मैं और मेरे बाबा

 जब आँखे खोली दुनिया मैं
तब बंद थीं मेरी आँखें
बाबा ने उठाया अपनी बाहों में
और बोले मन ही मन 
मैं हूँ साथ तुम्हारे पर जरा रखना सम्भल कर कदम
तब खोली आँखे मैंने देखा बाबा को...
उम्मीद से मुस्कुराते हुए...
कुछ बड़ी हुई लड़खड़ाते से कदम थामे उंगली बाबा की
बड़ी आगे...
तब बाबा बोले ..हौले से सम्भल कर रखना कदम

 कुछ बड़ी हुई जाना आस पास को
समझ तो आयी और नादानी और चंचल मन 
लेने लगा हिलोरें... उड़ने लगी मैं पंख लगा
तब बाबा बोले..कुछ हिदायत से...सम्भल कर रखना कदम

धीरे धीरे वक्त बदला
मैंने रखा कदम सपनों की रंगीन दुनिया में
भाने लगी मुझे चकाचौंध 
तितलियों के शहर की तितली मैं भी चाहती थी बनना
उड़ान भरने को आतुर मन संभालूं कैसे मन
ज्यूँ ही लड़खड़ाने लगे कदम
मूक दर्शक बने बाबा बोले...
सुन बिटिया...ये तिलिस्म का शहर है
जरा सम्भल कर रखना कदम
बाबा की हर हिदायत पर चाहे अनचाहे 
मैं बढ़ती गयी..कही खुद को मारा कहीं खुद मरी
पर बाबा की बात ना गिरने दी ना टाली
बस चलती रही सम्भल कर...

वक्त में फिर फेर बदल किया...
बाबा ने टटोला मेरा मन 
पर मैं तो बाबा के उसूलों पर चली
कैसे भटकती राह सम्भल जो थे मेरे बाबा

उम्मीद और आशाओं का दामन थामे 
नम आँखों से निहारते मुझको 
बिन बोले वो सब कुछ बोल
 थमा दिया मेरा हाथ उन अनजाने हाथों में
जहाँ थी हर घड़ी मेरी परीक्षा मुझे खुद ही था सम्भलना
वहाँ बाबा तो नहीं थे पर...फिर भी बाबा साथ थे
जहाँ लगी मैं डगमगाने वहीं याद आती बाबा की...जरा सम्भल कर चलना बिटिया ये दुनिया बड़ी संग दिल है...

आज बरसों बाद...
बाबा तो नही रहे..यही शाश्वत नियम है...
बाबा की जगह मैं खुद खड़ी हूँ..
पर फिर भी बाबा की अनुगूंज मेरे अंतर्मन में
गूंजती है... जरा सम्भल कर चलना बिटिया 

सोचती हूँ...आज कितना सुहाना संगम था
हिदायतों का उम्मीदों से भरा 
मैं और मेरे बाबा का
डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"


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