वो कभी सूखते नहीं हैं...
समेटे रखते हैं अपने अंदर यादों की नमी को
तभी तो जब भी देखो ताजगी से लबरेज मिलते हैं
मयस्सर नही उनको किसी का साथ
फिर भी यादों की गठरी खुद ही ढोते हैं...
ना जाने कितने अल्हड़ पलों को अपने अंदर
खामोशी से दबाए किताबों में बंद पड़े हैं...
पर फिर भी...
अपनी भीनी सी महक से सरोबार आज भी करते हैं
यही तो वो फूल हैं...जो किताबों में बंद हैं
जब भी फुर्सत में पलटी जाती हैं वो किताबें
आँखों में कोरों में चमकने लगती हैं वो
मोती सी ओस की बूंदें...
तभी तो...जब भी खोलो किताबें...
वो उनमें रखे वो फूल सूखते नही...
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