सोमवार, 23 जनवरी 2023

पुरूष



अकसर सुना जाता है .....और ....जाता रहा है..... और.... शायद सुना जाता रहेगा... कि वो पुरूष है कठोर तो होगा ही... सब कुछ संभाल लेगा... हर बडी से बड़ी और छोटी से छोटी जिम्मेदारियों से लाद दिया जाता है उसका कंधा... और बना दिया है सुकुमार से कठोर....
       सच कहूं तो पुरूष कठोर नहीं होता बल्कि उसे बना दिया जाता है.... अमूमन देखा जाए तो बचपन से किशोर और किशोर से युवा और प्रोढ़ावस्था तक उसे सिर्फ और सिर्फ दायित्व ही मिलता है...प्रेम तो मिलता ही नहीं... यदि प्रेम मिलता भी है तो दायित्व की चाशनी में लिपटा हुआ....
         जबकि पुरूष के दिल में भी होते हैं सुकोमल भाव सुमधुर अहसास... धड़कता है उसका भी दिल... टूटता और बिखरता है वो भी.... चाहता है वो भी एक सुकोमल कंधा जहां खो सके वो स्वयं को... जुड़ जाए वो एक अहसास से .... वो भी संजोता है सपने ...देखता है ख्वाब....
   पर सारे भाव खो से जाते हैं कहीं... विलीन हो जाते हैं अंतर्मन के उदगार... कभी दायित्वों का वास्ता देकर तो कभी जिम्मेदारियों को गिना कर ....और बना देते हैं पुरुष को गंभीर पुरूष... अश्रु विहीन आंखों का मालिक 
         पर एक बात अक्षरत: ये भी सच है पुरुष को समर्पित भाव से  प्रेम करने वाली स्त्री जानती है....
पुरूष अथाह प्यार सरलता कोमलता का कोष होता है...बिलकुल निर्मल जल का अथाह सागर सा....
ऐसी स्त्री के आगोश मे वह पिघलता है रो तक लेता है...
खोल देता है अपनी जिन्दगी की किताब के हर पन्ने को... 
        सच पुरूष कठोर नहीं होता वो भी जीना चाहता है उन्मुक्त प्रेम में गोते लगाना चाहता है...प्रेम के अथाह समुद्र में  डूबकर जीना चाहता है...

# नीलम गुप्ता "नीरा"

रविवार, 20 नवंबर 2022

कर्म फल



 आज दिनभर के काम निबटा कर सोचा कुछ पल आराम करूं ... जैसे ही हल्की सी आंख लगी ही थी कि...बाहर से कुछ आवाजें आ रही थी जोर जोर से...पहले तो इग्नोर किया और करवट बदल कर फिर से सोने का प्रयास करने लगी परंतु  आवाजें और भी तेज होने लगी.... मैं बेमन से उठकर बाहर गई ...तो मेरी आंखे खुली की खुली रह गईं...नींद तो जैसे  पता नहीं कहां चली गई....
        मेरे घर के सामने वाले घर से लगे हुए घर पर एक ट्रक खड़ा था .. उस पर पटक पटक कर समान रखा जा रहा था .... वहीं पर आंटी खड़ी अपने आंचल से मुंह ढके रो रही थी और अंकल जी भी चुपचाप नम आंखों से ये नजारा देख रहे थे....
       बात को समझते मुझे वक्त नहीं लगा....वही किस्से घर घर के...वही कहानी ....रोज पुरानी होती नई सी....
        पर मैं सोचने पर विवश हो गई कि ....आखिर दोष किसका है...माता पिता का या फिर बच्चों का... क्यों हम अपने बच्चों को जरूर से ज्यादा सुविधा देते हैं...हमारी परवरिश में पैसे की बू क्यों आती है...क्यों नहीं हम बच्चों को ये सिखाते कि... सीमित संसाधनों  में कैसे जीते हैं....शायद उस वक्त हमें अपने कमाए पैसे और अपने रुतबे का घमंड होता है... हम आंखों पर पट्टी बांध लेते हैं...आगे कुछ भी नहीं सोचते कि...इसके परिणाम क्या होंगे...
     आज उन्हीं सब का नतीजा अंकल और आंटी जी भुगत रहे हैं....अंकल जी कस्टम विभाग में आफिसर की पोस्ट पर कार्यरत थे  घर और ऑफिस दोनों जगह रुतबा था कमाई भी अंधाधुंध थी...आंटी भी बड़ी अफसरी में रहती...दो बेटे थे... पूरी कालोनी में सबसे पहले उन बच्चों के पास ही कोई भी नई चीज आती...पहले खिलौने फिर साइकिल और फिर बाइक... 
मेरा तो आंटी जी से केवल नमस्ते तक ही सीमित था ... पर कालोनी में बातें तो आ ही जाती हैं घूम फिर कर...
      ऐसे ही एक दिन सुना अंकल जी के बेटे कॉलेज जाने वाले हैं तो अंकल जी ने उन्हें गाड़ी दिलवा दी...
       बस इसी तरह वक्त बीतता गया .... दोनों बेटों को जॉब लगी..... आलीशान शादियां हुई .. आधुनिक बहुएं आईं...अंकल जी ने एक मकान और बनाया पुणे में ... उस मकान में बड़े बहू और बेटे रहने लगे... फिर अंकल जी रिटायर हो गए और अपने छोटे बेटे के पास लखनऊ में ही रहने लगे....
       सब कुछ सामान्य सा चल रहा था...अंकल आंटी कभी कभार पुणे चले जाते ... पर धीरे धीरे उनका पुणे जाना भी कम और फिर बंद ही हो गया...
           अंकल आंटी अब दिनभर घर पर ही रहते.. आंटी तो घर के कामों में और बच्चों को संभालने में व्यस्त रहती और अंकल जी बाहर के कामों में और छोटी  बहू किट्टी पार्टी और पार्लर में.... 
  एक दो दिन  से अड़ोस पडौस से कुछ सुबुगाहट तो थी ... पर मैने ध्यान नहीं दिया और आज इतना सब कुछ देखकर...समझ ही नहीं आया ...
    मै छत पर खड़ी ये सब देख ही रही थी कि मेरी पढ़ौसन ने बताया ....अंकल आंटी अपने गांव वाले घर जा रहे हैं....छोटी बहू ने अभी 15 दिन पहले ही जबरदस्ती ये मकान अपने नाम करा लिया ...अब उसका कहना है कि मेरे घर से जाओ...उनका बेटा मूक दर्शक बना मौन सहमति दे रहा था अपनी पत्नी को....
        वैसे तो ये कोई नया किस्सा नहीं है ...घर घर की कहानी है कहीं कम तो कहीं ज्यादा.... पर मैं सोच रही थी कि हम एक उम्र में अंधाधुंध पैसा तो कमा लेते हैं आधुनिकता की दौड़ में आंख बन्द कर भागने के लिए.... तब हम ये नहीं सोचते कि जो पैसा हम गलत तरीके से अपने परिवार को सुख सुविधा देने के लिए कमा रहे हैं..... उसमें ना जाने कितनों की बददुआ और हाय लगी है.... हम ये भूल जाते हैं कि हमारे कर्मो को..... स्वयं हमें यहीं और इसी जन्म में भुगतना पड़ता है....सारा हिसाब यहीं चुकता करना पड़ता है.... और हम भूल जाते हैं कि इसके परिणाम क्या होंगे...
        पर अंकल आंटी की दशा देख  मेरी आंखें नम थीं.... मैं सोच रही थी हम क्यों करते हैं ये सब .... क्यों अनजान बने रहते हैं जन बूझ कर.... क्यों हम संतोष नहीं कर पाते...यही सोचते सोचते दो गर्म बूंद मेरे गालों पर से गुजर गई.....
और देखते ही देखते अंकल आंटी चल दिए अपने गांव एक बार फिर से अपना घरौंदा बनाने..अब शायद  उनके पास कोई तथकथित कोई अपना नहीं होगा....बस होंगे तो एक दूसरे की लाठी बने झुर्रियों भरे  दो जोड़ी मजबूत हाथ....

Dr Neelam Gupta "नीरा"

मंगलवार, 8 नवंबर 2022

l LOVE U

पापा से हमेशा कम बोलने बाली ...उनकी हर बात को आदेश समझ कर मानने वाली ...कभी कदास ही पापा के पास बैठने वाली...पर आज जब पापा के पास बैठी तो मुझे फायदा हुआ.... बातों ही  बातों में उन्होने बताया ...प्यार कैसे जताया जाता है.... बोले मेरे प्यार जताने का तरीका जुदा  है तेरी मां से.... मै I Love You नही बोलता  तेरी मां से.... जब वो पूछती है सब्जी क्या बनाऊं...तो कहना आज तुम्हारी पसंद की....कोई डोरवेल बजाए तो... झट दरवाजे पर जाकर दरवाजा खोलना...कभी बाजार से आए तो एक गिलास पानी का देना....कभी कभी एक प्याली चाय अपने हाथो से बना कर पिला देना... जब वो गुमसुम सी हो उसको हंसा देना ... और हां कभी कभी चार बातें सुना उसको छेड़ना....सामने रखी चीज को अनदेखा कर उसको पुकारना....पापा बोले जा रहे थे हर एक बात और मै सुने जा रही थी....
         तब मैंने सोचा ... सच में प्यार ऐसा होता है...क्या हम भी ऐसा ही प्यार करते हैं  ...हम भी क्या इसी प्यार को जीते हैं ....अंदर से एक आवाज  आई.... नहीं 
  हम  तो  बस वेलेंटाइन डे को ही प्यार मानकर मना लेते है प्यार को केवल I Love U में ही जी लेते हैं.. ...अब सोच लिया मैने  जिस दिन मां पापा जितना प्यार करना सीख जाऊंगी..... अपने प्यार को परवाह से जता पाऊंगी ...उसी दिन से हर रोज असली वेलेंटाइन डे  मनाऊंगी.... 💕

शनिवार, 5 नवंबर 2022

कड़वा सच

जीवन की सच्चाई 

हम जिन्दगी भर स्वयं ही परेशान रहते हैं... सच में देखा जाए तो जिंदगी बहुत सीधी सरल और सहज हैं ...लेकिन हम बिना बात जिन्दगी को इतना जटिल और भयावह बना देते हैं कि वो हमें पहाड़ सी लगने लगती है.... 
मानती हूं कुछ सपने कुछ इच्छाएं कुछ लालसाएं होती हैं एक उम्र पर  और ये भी सच है कि एक उम्र के बाद सब खत्म भी हो जाती है...पर पता नही कब एक अलग  दुनिया बना लेते हैं  और सब कुछ जानकर अनजान बने रहते हैं....
हम जिन्दगी भर बड़ा छोटा अपना पराया में उलझे रहते हैं जबकि एक वक्त पर हम सभी एक से होते हैं....बस 
मत परेशान हो, क्योंकि आमतौर पर...

 1. चालीस साल की अवस्था में "उच्च शिक्षित" और "अल्प शिक्षित" एक जैसे ही होते हैं। (क्योंकि अब कहीं इंटरव्यू नहीं देना, डिग्री नहीं दिखानी).

2. पचास साल की अवस्था में "रूप" और "कुरूप" एक जैसे ही होते हैं। (आप कितने ही सुन्दर क्यों न हों झुर्रियां, आँखों के नीचे के डार्क सर्कल छुपाये नहीं छुपते).

3. साठ साल की अवस्था में "उच्च पद" और "निम्न पद" एक जैसे ही होते हैं। (चपरासी भी अधिकारी के सेवा निवृत्त होने के बाद उनकी तरफ़ देखने से कतराता है).

4. सत्तर साल की अवस्था में "बड़ा घर" और "छोटा घर" एक जैसे ही होते हैं। (बीमारियाँ और खालीपन आपको एक जगह बैठे रहने पर मजबूर कर देता है, और आप छोटी जगह में भी गुज़ारा कर सकते हैं).

5. अस्सी साल की अवस्था में आपके पास धन का "कम होना" या "ज्यादा होना" एक जैसे ही होते हैं। (अगर आप खर्च करना भी चाहें, तो आपको नहीं पता कि कहाँ खर्च करना है).

6. नब्बे साल की अवस्था में "सोना" और "जागना" एक जैसे ही होते हैं। (जागने के बावजूद भी आपको नहीं पता कि क्या करना है).

जीवन को सामान्य रुप में ही लें क्योंकि जीवन में रहस्य नहीं हैं जिन्हें आप सुलझाते फिरें.

आगे चल कर एक दिन सब की यही स्थिति होनी है, यही जीवन की सच्चाई है...

चैन से जीने के लिए चार रोटी और दो कपड़े काफ़ी हैं... पर ,बेचैनी से जीने के लिए चार गाड़ी, दो बंगले और तीन प्लॉट भी कम हैं !!

ये जीवन की  कड़वी सच्चाई है जिसने भी इसको स्वीकार कर लिया उसे परमानंद ही प्राप्ति हो जायेगी  इसलिए  चैन से रहिए खुश और मस्त रहिए....
और हां बच्चों को वक्त और संस्कार दीजिए .... यही हम सभी की जमा पूंजी है 💕

(इस पोस्ट को मैं मिश्रित पोस्ट का नाम दूंगी क्योंकि इसमें कुछ मेरा और कुछ किसी और का लिखा है फर्क क्या पड़ता है जीवन की कड़वी सच्चाई  लिखी है जिसे हम स्वीकारते ही नहीं  अंत सब का एक ही है....कितने भी ऐशो आराम में जी लो पर शमशान में सबका बिस्तर एक सा ही है )

नफा नुकसान

नफा नुकसान

रविवार का दिन था.... ऑफिस की छुट्टी थी.... फिर नवंबर में हल्की सर्दी भी होने लगी थी... मैं आराम से बिस्तर पर बैठ कर फुर्सत में अखबार पढ़ रहा था... साथ में पत्नी चाय देकर गई थी वह मैं पी रहा था..... वैसे तो फुर्सत ही कहां मिलती है.... सुबह उठो तैयार होओ... बच्चों को स्कूल छोड़ो और ऑफिस जाओ...... बच्चों का स्कूल ऑफिस के रास्ते में ही पड़ता था...... इसलिए उनको छोड़ता हुआ ऑफिस निकल जाता हूं.... यही क्रम पूरे हफ्ते चलता है..... संडे के अतिरिक्त किसी भी दिन फुर्सत नहीं मिलती इसलिए सारे  काम संडे को ही फुर्सत में होते हैं...।
      अभी चाय की चुस्की ली ही थी कि.....डोर बेल बजी मैं अलसाया सा नहीं उठा ....सोचा पत्नी ही दरवाजा खोल देगी.... शायद पत्नी किसी काम में व्यस्त थी ....या फिर उसने डोरबेल नहीं सुनी .....तभी दोबारा डोर बेल बजी तो मैं अपने आप से बोला...... कौन है भाई इतनी सुबह सुबह संडे के दिन तो फुर्सत से रहने दो....।
 मैंने  अनमने मन से उठकर..... जैसे ही दरवाजा खोला.....सामने  एक स्मार्ट सा युवक खड़ा था.... मैं अभी उसे ऊपर से नीचे तक निहार ही रहा था.... तभी उसने बड़ी शालीनता भरे अंदाज से कहा.... नमस्ते अंकल जी और मेरे पैर छुए......मैंने भी प्रत्युत्तर में नमस्ते बेटा कहा .....पर मैं असमंजस में था और पहचानने की कोशिश कर रहा था...... कि इतना अदबदार शालीन युवक कौन है ......मेरे दिमाग की घड़ी वक्त से भी तेज चल रही थी उस वक्त.....मैं पहचानने की कोशिश कर ही रहा था पर असफल ही रहा....
          शायद वह मेरी मन: स्थिति समझ गया था .....बोला.... अंकल जी आपने शायद मुझे पहचाना नहीं ....... मैं कुछ झेंप सा गया ......जैसे कि मेरी चोरी पकड़ी गई हो.....मैंने जल्दी से कहा पहले अंदर आओ ....तब बात करते हैं..... वह बिना कुछ बोले मेरे पीछे पीछे ड्राइंग रूम में आ गया ......मैंने बैठने का इशारा किया तो ..... वो बैठ गया..... इतने में पत्नी भी अंदर से कौन है ....??   कहते हुए आ गई ......साथ ही पानी का गिलास  भी लाई...।
      वह युवक सोफे पर बैठ गया और ड्राइंग रूम का उड़ती नजर से मुआयना करने लगा और मैं उसका......वो शायद सोच रहा हो कहां से बात शुरू करे....     मैं कुछ कहता  इससे पहले ही वो बोल पड़ा .....लगता है अंकल जी  आपने मुझे पहचाना नहीं..... मैंने कुछ झेंपते हुए कहा..... शायद उम्र हो हो चली है मेरी .....इसलिए याददाश्त साथ नहीं दे रही..... युवक सधी हुई आवाज में बोला .....मैं वही हूं..... जो अपने पापा के साथ आया था..... 5 साल पहले आपका स्कूटर लेने के लिए आया था तब हमारे पास पैसे कम थे ...लेकिन आपने अपना स्कूटर हमारी मजबूरी समझते हुए हमें ....... नुकसान में बेच दिया ......और साथ ही मिठाई और पेट्रोल के  ₹500 भी दिए..... वह युवक धाराप्रवाह बोले जा रहा था .....उस दिन बहुत दिनों बाद हमने खरीद कर मिठाई खाई थी....... मैंने तभी सोच लिया था कि कुछ बन जाने पर आप जैसे देवता आदमी से मिलने जरूर आऊंगा .....
          आपके स्कूटर ने मेरी  क्या पूरे परिवार की स्थिति ही बदल डाली ......आपको पता है..... अंकल जी वह स्कूटर आज भी मेरे घर पर है .....आपसे स्कूटर लेकर मेरा आने जाने का समय बच जाता था..... तब मैंने ट्यूशन पढ़ाने शुरू कर दीए.....जिससे पापा को कुछ मदद मिल जाए..... फिर मैंने बीटेक ऑनर्स में पास किया...... 1 साल छोटी मोटी नौकरी की साथ ही ट्यूशन भी पढ़ाता रहा .....घर की स्थिति सुधरने लगी थी..... फिर पुणे की एक कंपनी में अच्छी जॉब मिल गई ......आज जैसे ही मैं घर आया ......तो आपसे मिलने चला आया ...।   आपको कुछ देने लायक तो नहीं हूं पर आपके एहसान का बदला कभी भी नहीं चुका सकता...... मैं दिल से आपका शुक्रिया करता हूं...... सच में आपके स्कूटर ने हमारी जिंदगी बदल दी .....वह लगातार एक सुर में बोलता ही जा रहा था .....और.... मैं ....कभी पत्नी को कभी उस युवक को देख रहा था...... मेरे पास कुछ शब्द भी नहीं ही नहीं थे...... मैं सिर्फ इतना ही बोल पाया ......बेटा नफा नुकसान तो चलता ही रहता है .....उस वक्त मुझे लगा तुमको स्कूटर की ज्यादा जरूरत है...... तभी मेरी पत्नी चाय ले आई बोली...... बेटा नाश्ता करोगे ......उसने केवल चाय पी और फिर से धन्यवाद कहते हुए  मेरे और पत्नी के पैर छू कर चला गया.....।
 मैं वहीं सोफे पर धंसा रहा .....मेरे सामने आज से 5 साल पहले का  पूरा घटनाक्रम घूम गया ..... स्कूटर पुराना हो गया था..... घर में बेकार पड़ा था सो  OLX  में   30,000  पर डाल दिया ......बहुत से कॉल आए 27000 , 25000 , 24000 , 28000 के .....बस एक कॉल आया 29000 का ..... मैंने मन बना लिया कि 29000 में बेच ही दूंगा.....।
     अगले दिन सुबह एक कॉल आई....साहब आपने OLX  पर स्कूटर के लिए डाला है..... मैंने संचित सा जवाब दिया .....हां
   उधर से एक दबी सी आवाज आई साहब मैं जोड़ तोड़ कर  ₹24000  ही कर पाऊंगा  ....जो कम पड़ेंगे तो मैं कहीं से इंतजाम कर लूंगा ......अगर संभव हो तो वह स्कूटर मुझे ही देना.....  मेरे बेटे को बहुत जरूरत है .....उसका समय बच जाएगा साहब..... वह पढ़ाई में बहुत अच्छा है....।
            मुझे  लगा जैसे सच में उसको जरूरत हो .....उसकी आवाज में कुछ ऐसी मजबूरी की कसक थी कि..... लगा जैसे सच में उसको जरूरत है ....मैंने कहा...... ठीक है तुम कल आ जाओ....।
      फिर शाम को दो तीन बार उसका फिर कॉल आया साहब.... कल जरूर आऊंगा.... पैसों का इंतजाम कल तक हो ही जाएगा..... कल दूसरा शनिवार था मेरी छुट्टी भी थी ...।
         वह शायद रात को सो भी नहीं पाया होगा..... सुबह 10:00 बजे ही आ गया .....अपने बेटे के साथ ....हाथ जोड़कर खड़ा था....उसने  कहा ....साहब बड़ी मुश्किल से इंतजाम हो पाया ... और नोट मेरे हाथ में थमा दिए
फिर मुझसे बोला .....साहब गिन लीजिए ...... उनमें मुड़े पुराने ...500 के , 100  और 50  के बहुत से नोट थे...... मैं समझ गया उसने कैसे इंतजाम किया होगा ....मैंने कहा.... तुमने गिन लिए तो पूरे ही होंगे.... उसका बेटा हाथ से स्कूटर साफ कर रहा था.... उसकी आंखों में चमक थी ..... उस वक्त मुझे लगा कुछ नुकसान तो हुआ पर किसी का भला हो गया...... वास्तव में ये जरूर मंद है .....हाथ जोड़कर बार-बार धन्यवाद देते हुए .....वह जैसे ही जाने के लिए मुड़ा..... मैंने उसको आवाज दी.... और ....पांच सौ का नोट देते  हुए मैं बोला...... घर जा रहे हो तो.... बच्चों के लिए मिठाई लेते जाना और हां जरूरत पड़े तो पेट्रोल भी डलवा लेना .....मिठाई और पेट्रोल दोनों इसमें आ जाएंगे....।
             उसके जाने के बाद मैंने सोचा..... मुझे नुकसान तो ज्यादा नहीं हुआ .....पर अगर किसी का भला हो जाए तो क्या बुराई है..... मेरा स्कूटर किसी के काम आए इससे ज्यादा और क्या चाहिए .....नफा नुकसान तो चलता ही रहता है....।
          मेरी तंद्रा तब टूटी जब..... पत्नी ने आकर कहा.... देखिए 12:00 बज रहे हैं फटाफट नहा कर आइए.... मैं नाश्ता लगाती हूं .....और मैं.... पत्नी के आदेशानुसार प्रसन्न मन से नहाने चला गया....।

 # Dr नीलम गुप्ता  "नीरा"

बुधवार, 2 नवंबर 2022

मेरे सखा

आज बरसों बाद भी
तुमको पढ़ रही हूं....
सोचती हूं कभी इस तरह मिले थे हम
 शायद हर रोज ही...
 जब भी मैने पुकारा तुम हमेशा 
मेरे साथ थे....
ना वादे ना कसमें ...
पर हर रोज मेरी शिकवे शिकायतें...
तुम सुनते फिर हौले से मुस्कुराते 
जैसे मेरी सारी उलझनों को सुलझाने का 
दारोमदार तुम पर हो...
और मैं बेफिक्र सी...
 कभी मां बन जाते तो कभी पिता 
तो कभी बड़ा या छोटा भाई
तो कभी सखा तो कभी सहेली...
 और .... मैं हर मसले का हल 
तुम मै ढूढती...जैसे तुम 
कोई अलाउद्दीन का चिराग हो...
सच कहूं तो ...
तुम मेरे लिए चिराग ही तो थे...
ना कोई इजहार था ना इकरार 
ना तुम्हारी कोई चाहत थी
ना मेरी...बस एक अलबेला रिश्ता 
पर कोई तो नेह डोर से बंधे थे हम...
 तभी तो तुम ....
आज भी मेरे उतने ही करीब हो
जितने तब....
मिलने ना मिलने का सवाल ही कहां था
तुम मुझे पढ़ते गए और मैं तुमको लिखती गई...
पर आज.... बरसों बाद
हर रोज पढ़ लेती हूं तुम्हें...
और बांच लेती हूं ख्यालों में...
  तुम आज भी मेरे अलाउद्दीन के चिराग हो 
 पता नहीं क्या रिश्ता है मेरा 
तुमसे.....
प्यार इश्क मोहब्ब्त चाहत का ...
अरे नहीं...
हमारा तो रूहानी रिश्ता है...
जिसका कोई नाम नहीं ...
बेनाम सा... सबसे कोसों दूर
मेरे सखा


 # नीलम "नीरा"

प्रेम

किसी ने कहा मुझसे.....
तुम बड़ा प्रेम लिखती हो...
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मैं हौले से मुस्कुराई...
फिर आहिस्ता से बोली... 
चलो तुम्हारी बात मानती हूं....
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आज से क्या...
 अभी से प्रेम लिखना छोड़ती हूं....
नफरत लिखना शुरू करती हूं...
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 इसका शुभारंभ मै...
अभी से तुमसे करती हूं...
बोलो मंजूर है...
फिर दोनो खिलखिलाए....

# नीलम "नीरा"