शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

दो बूँद

बहुत दिनों बाद

आज सोचा कुछ लिखूँ....
बाहर सर्द हवा ...
धुंध... 
धूप का कहीं नामोनिशान नहीं...

फिर भी...
अलसायी सी उठी...
कड़क अदरक इलायची
और कालीमिर्च लौंग डालकर बनाई मसाला चाय
और बैठ गयी कुर्सी पर...
आहिस्ता से चाय की चुस्की ली... 

बस फिर क्या....
मन को पँख लग गए ...
 उड़ चला बेलगाम सा...
उम्र के उस नादान मोड़ पर
जहाँ
खुद की सोच से समझदार सोच कोई नही होती ....
बेताज बादशाह सा....
.
.
.
कलम और पेन मेरे हाथ में...
.
.
.
कुछ कोरे पन्ने बेतरतीब से मेज पर...
.
.
.
 खोई हुई खोजती सी आँखे..…
.
.
.
आँखों के कोर नम हुए 
और
दो बूँद पानी टपका 
आँखों से ...
उस कोरे कागज पर...
बस
लिख दी अपनी  
पूरी दास्ताँ....
अनकही कहानी के रूप में...
उन दो बूँदों ने...
.
.
.
और मैं...
वहीं की वहीं
बैठी...
तय कर आई एक लम्बा सफर...
ठंडी होती हुई...
मसाला चाय के साथ...
.
.
.
सच कहूँ...
वही सब मसाला चाय
पर..
अब "वो" स्वाद कहाँ....
मसाला चाय में...
शायद वक्त के साथ 
मसाला बेरंग और 
बेस्वाद हो गया...

# डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"
 

गुरुवार, 20 जनवरी 2022

निःशब्द

नि: शब्द से ....
बैठे वो दोनों .....
एक दूसरे के सामने ....
निःशब्द
पलकें उठी...
नजरें मिली .....
और
 बात हो गयी ....
शिकवा भी था....
शिकायत भी थी....
मान भी था....
मनुहार भी था....
हौले से....
थरथराये लव...
पर निःशब्द 
और.....
बात हो गयी .....
नि:शब्द से...

#  नीलम. " नीरा "

बुधवार, 19 जनवरी 2022

मैं और तुम

कहानी 
मैं और तुम की

एक अनजान सा ...मैं
अनायास  टकरा गया ...तुम से

बस यूँ ही 
सफर जारी रहा
कुछ सामान्य सी 
हल्की मुलाकात

समय बीता
 मुलाकात गहरी हुई
 मैं और तुम  कुछ करीब आये

बस वक्त ने करवट बदली
कुछ फिजा में खुमारी ,
कुछ हंसी लम्हे.... कुछ पल
बस 
पंख लग गए सपनों को

और
मैं और तुम 
हम बन गए
उड़ने लगा वक्त 
परियो के देश 
आसमाँ  मौसम दिन रात 
सब मचलने लगे...
आगोश में आने को....

वक्त बीता
मौसम बदले 
सावन आया ,बसन्त आया 
उमस और तपाने वाली गर्मी 
फिर सर्द हवाएं  
और हर तरफ जमने लगा हिम

एक अन्तराल  

 मौसम दर मौसम बदलते गए
कौन रोक पाए है बदलते मौसम को
खुलने लगे बाहुपाश में बंधे बन्धन 
सिमट गया आसमान ,सारा जहाँ
और
बिखर गया हम 
वक्त ने फिर से  अपना रंग बदला 
रंगीन तस्वीर के रंग फीके पड़ने लगे 
बन्धन को बंधना खलने लगा 
सारे सपने सपने से हो गए ....

इसको
वक्त कहूँ या मौसम 
आहिस्ता से 
"हम "
फिर से 
"मैं" और  "तुम"  हो गया
एक रास्ते में फिर से 
एक मोड़ आ गया 
राहें एक से दो हो गयीं.....
डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

रविवार, 16 जनवरी 2022

प्रेम

प्रेम

प्रेम ...क्या है...?? केवल शव्द..? केवल भाव...? या फिर... एहसास...? 

सच कहूँ तो...प्रेम ना तो कोई शब्द है... ना भाव है... और ना ही कोई एहसास है... कि मन में उठा और लिख कर व्यक्त कर दो....!!

प्रेम एक शब्द नहीं मन के वो अव्यक्त से व्यक्त भाव है ...जिनको लिखना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है... मतलब प्रेम को शब्दों की परिधि में नहीं बाँधा जा सकता ...सच बात तो ये है  छोटा सा प्रेम शब्द अपने  अंदर इतने गहन भावों को समेटे हुए है जो बयां की परिधि से कोसो दूर है...
और फिर जो प्रेम परिभाषित हो जाये वो प्रेम कहाँ....कहाँ चलते हैं प्रेम में दायरे , सीमाएं , नियम और कायदे  ...प्रेम तो उन्मुक्त है बाबरा है दीवानगी है  ...!!

मानती हूँ कभी जरूरत पड़ती है  प्रेम को शब्दों की ...पर रूहानी पर हमेशा से अव्यक्त ही रह है... वो तो मूक है...फिर चाहे किसी से भी हो .. चाहे पशु पक्षी हों या मनुष्य..
प्रेम की मौन भाषा सभी को समझ आती है.. जिसने समझ लिया उसका जीवन प्रफुल्लता से परिपूर्ण हो गया... उसका रोम रोम सन्त हो जाता है जब प्रेम अनन्त हो जाता है 💐

शनिवार, 8 जनवरी 2022

स्त्री

सुनो.स्त्री
मानता हूँ       मैं ..
कि तुमसे कम हूँ 
शायद कमतर भी हूँ..   पर ...
ये कोई मेरी कमजोरी नहीं...
ये तो रिश्तों को खुद से ज्यादा 
सम्भालने की मेरी कोशिश है...




सुनो ….स्त्री
ये भी मानता हूँ       मैं..
कि तुम्हारे जितना
नाजुक कोमल और स्नेहिल नहीं हूँ 
और शायद बन भी ना पाऊँ
पर ये भी मेरी कोई कमजोरी नहीं
ये तो रिश्तों को सम्भल बन
एक मजबूत नीव  बनाने की मेरी
पुरजोर कोशिश है...

सुनो.... स्त्री
मैं ये भी मानता हूँ....
जब भी मैं टूटता हूँ बिखरता हूँ
मुझे भी जरूरत होती है...
स्नेहिल सहारे की...
जो निःस्वार्थ लगा ले सीने से
एक माँ की तरह , बहन की तरह,
प्रेमिका की तरह भर ले अपने आगोश में...
जिससे मैं फिर नए जोश से
खड़ा हो सकूँ सम्भल बनने के लिए...

सुनो..…स्त्री
तुम हर तरह से आँकना मेरे वजूद को
पर ...
कभी सवाल ना खड़े करना मेरे 
पुरुषार्थ पर...मेरे पौरूष पर
कभी तुम ये दम्भ ना भरना
कि तुम सर्वस्व हो और 
मैं तिनका भी नहीं...
मेरे अस्तित्व का कुछ अस्तित्व ही नहीं...
क्योंकि..
सुनो ....स्त्री
चिन्दी सा ही वजूद है मेरा चाहे तेरी जिन्दगी में
पर ये मत भूल कि मेरे बिना तू पूरी भी नहीं है...


डॉ नीलम गुप्ता

गुरुवार, 23 सितंबर 2021

निःशब्द

निःशब्द

जिन्दगी में उतार चढ़ाव तो आते ही रहते हैं ..यही है जिन्दगी ...परन्तु फिर भी कभी कभी जीवन में ऐसी घटनाएं
घटती हैं जिनके बारे में कह पाना आसान नहीं होता या यूँ कहिए तो हम पूरी तरह निःशब्द हो जाते हैं | हमारे पास कहने को बहुत कुछ होता है फिर भी दिल चुप हो जाना चाहता है...किंग्कर्तव्य विमूढ़ से हम स्वयं को अनिश्चय की स्तिथि में पाते हैं...||

कभी कभी  हमें प्रकृति भी दिखाती हैहमें ऐसे अद्भुत नजारे जिसमे हम स्तब्ध होकर खो जाते हैं हमारे पास कहने के कुछ बचता ही नहीं है.. हम अपलक निहारते हैं उस मंजर को …. उन अविस्मरणीय दृश्यों को देख  कल्पना मात्र से हमारा मन मयूर पुलकित हो झूमने लगता है...जैसे इंद्र धनुष के रंगों का मिलकर आसमान में बिखर अदभुत छटा बिखेरना...बिना  रुके काले बादलों का भागते जाना...पुरवाई पवन का लहराते पेड़ो से बातें करना,पहाड़ की अनंत ऊँचाइयों से झरनों का निरंतर बहते जाना,चहकते  हुए  पंछियों का आपस में बातें करना,नदियों का कल कल ध्वनि करते अविरल बहते जाना ....बारिश होते होते सुनहरी धूप का चमकना...और भी बहुत कुछ ....!!

इतना ही नहीं इसके अलावा भी बहुत से लम्हें ऐसे होते हैं जो हमें निःशब्द कर जाते हैं जैसे-किसी इंसान का सोच से परे काम कर जाना,हृदयस्पर्शी कविताओं का मूल भाव समझ जाना.... दरअसल निःशब्द होना भी सबकी प्रकृति नहीं होती,जो किसी के मर्म को समझ पाए सच्चे मायने में यही          निःशब्द होता है...|

 सच कहूँ तो....
जीवन मे वैसे तो प्रतिपल हमारे आसपास कुछ ना कुछ घटित होता ही रहता है परंतु हमारी सोच से परे आकस्मिक होने वाली सुखद और दुखद घटनाएं ..जब हम कहना तो बहुत कुछ चाहते हैं... पर कह नहीं पाते....तब ऐसा नहीं है कि हमारे पास शब्द नहीं होते ...परन्तु उन शब्दों को व्यक्त नहीं कर पाते ...अपने मनोभावों को शब्दों की माला कहूँ या फिर शब्दों का जामा नहीं पहना पाते ...यही है "निःशब्द


मंगलवार, 21 सितंबर 2021

व्यक्तित्व

आप अपने आप को एक व्यक्ति के रूप में कैसे वर्णित करते हैं?
 जीवन में आपकी प्राथमिकताएं क्या हैं? 

➡️स्वंय के व्यक्तित्व का अवलोकन करना वो भी स्वयं आसान नहीं होता ...क्योंकि हम कितने भी निष्पक्ष रहें फिर भी कहीं ना कहीं चूक हो ही जाती है |  फिर भी मैं यथासम्भव प्रयास करूँगा कि मैं स्वयं का निष्पक्ष अवलोकन करूँ |
सच कहूँ तो हमारी पहचान हमारे व्यक्तित्व से ही होती है  | और हमारा व्यक्तित्व हमारे मन में उठ रहे सकारात्मक और नकारात्मक विचारों द्वारा ही सँवरता और निखरता है |इन्ही सकारात्मक और नकारात्मक विचारों में तालमेल बैठता हुआ मैं स्वयं को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखता हूँ ..जो कि माँ के संरक्षण में रहते हुए... उनके द्वारा दिये हुए संस्कारों और उनकी आर्थिक स्थिति को देखकर एवं महसूस करके मैं उनके लिए मजबूत सम्बल के रूप में हमेशा ही उनके साथ खड़ा रहूँ |
इतना ही नही मुझे लगता है कि मैं परिस्थितियों से सामंजस्य स्थापित करने वाले  एवं अपने विचारों को सही दिशा देने वाले  युवा के रूप में निखर रहा हूँ |
कभी- कभी मैं सरल सहज और शान्त स्वभाव का होते हुए भी आक्रोशित हो जाता हूँ शायद यह मेरी युवावस्था के का प्रभाव है | परन्तु फिर भी मैं स्वयं को समय और परिस्थितियों से तालमेल बैठाने वाला और यथासम्भव दूसरों के  मनोभावों को समझ सम्मान करने वाले युवा के रूप में देखता हूँ |

2:-  अब मैं बात करता हूँ प्राथमिकता की..तो जहाँ तक प्राथमिकता का सवाल है जीवन में वैसे तो समय , परिस्थिति एवं उम्र के हिसाब से प्राथमिकतायें बदलती रहती हैं |
लेकिन जहाँ तक मेरी इस वक़्त की प्राथमिकता का सवाल है  तो मैं अपने लक्ष्य को पाने के लिए एकाग्रता पूर्वक प्रयत्नशील रहते हुए समय का सदुपयोग करूँ ...क्योंकि बीता हुआ समय वापस नहीं आता  | बस इसी बात को ध्यान में रखते हुए भरसक प्रयत्न करूँ जिससे कि निकट भविष्य में मैं अपने परिवार एवं समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह ईमानदारी और कुशलता पूर्वक स्वयं के  संयत रखते हुए कर सकूँ | जिससे  कि भविष्य में मैं अपने देश और समाज में एक जिम्मेदार नागरिक बन कर लोगों में एक उदाहरण के रूप में पेश कर सकूँ  |