सुनो.…स्त्री
मानता हूँ मैं ..
कि तुमसे कम हूँ
शायद कमतर भी हूँ.. पर ...
ये कोई मेरी कमजोरी नहीं...
ये तो रिश्तों को खुद से ज्यादा
सम्भालने की मेरी कोशिश है...
सुनो ….स्त्रीये भी मानता हूँ मैं..कि तुम्हारे जितनानाजुक कोमल और स्नेहिल नहीं हूँऔर शायद बन भी ना पाऊँपर ये भी मेरी कोई कमजोरी नहींये तो रिश्तों को सम्भल बनएक मजबूत नीव बनाने की मेरीपुरजोर कोशिश है...
सुनो.... स्त्रीमैं ये भी मानता हूँ....जब भी मैं टूटता हूँ बिखरता हूँमुझे भी जरूरत होती है...स्नेहिल सहारे की...जो निःस्वार्थ लगा ले सीने सेएक माँ की तरह , बहन की तरह,प्रेमिका की तरह भर ले अपने आगोश में...जिससे मैं फिर नए जोश से
सुनो..…स्त्री
तुम हर तरह से आँकना मेरे वजूद को
पर ...
कभी सवाल ना खड़े करना मेरे
पुरुषार्थ पर...मेरे पौरूष पर
कभी तुम ये दम्भ ना भरना
कि तुम सर्वस्व हो और
मैं तिनका भी नहीं...
मेरे अस्तित्व का कुछ अस्तित्व ही नहीं...
क्योंकि..
सुनो ....स्त्रीचिन्दी सा ही वजूद है मेरा चाहे तेरी जिन्दगी मेंपर ये मत भूल कि मेरे बिना तू पूरी भी नहीं है...
डॉ नीलम गुप्ता

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