शनिवार, 8 जनवरी 2022

स्त्री

सुनो.स्त्री
मानता हूँ       मैं ..
कि तुमसे कम हूँ 
शायद कमतर भी हूँ..   पर ...
ये कोई मेरी कमजोरी नहीं...
ये तो रिश्तों को खुद से ज्यादा 
सम्भालने की मेरी कोशिश है...




सुनो ….स्त्री
ये भी मानता हूँ       मैं..
कि तुम्हारे जितना
नाजुक कोमल और स्नेहिल नहीं हूँ 
और शायद बन भी ना पाऊँ
पर ये भी मेरी कोई कमजोरी नहीं
ये तो रिश्तों को सम्भल बन
एक मजबूत नीव  बनाने की मेरी
पुरजोर कोशिश है...

सुनो.... स्त्री
मैं ये भी मानता हूँ....
जब भी मैं टूटता हूँ बिखरता हूँ
मुझे भी जरूरत होती है...
स्नेहिल सहारे की...
जो निःस्वार्थ लगा ले सीने से
एक माँ की तरह , बहन की तरह,
प्रेमिका की तरह भर ले अपने आगोश में...
जिससे मैं फिर नए जोश से
खड़ा हो सकूँ सम्भल बनने के लिए...

सुनो..…स्त्री
तुम हर तरह से आँकना मेरे वजूद को
पर ...
कभी सवाल ना खड़े करना मेरे 
पुरुषार्थ पर...मेरे पौरूष पर
कभी तुम ये दम्भ ना भरना
कि तुम सर्वस्व हो और 
मैं तिनका भी नहीं...
मेरे अस्तित्व का कुछ अस्तित्व ही नहीं...
क्योंकि..
सुनो ....स्त्री
चिन्दी सा ही वजूद है मेरा चाहे तेरी जिन्दगी में
पर ये मत भूल कि मेरे बिना तू पूरी भी नहीं है...


डॉ नीलम गुप्ता

कोई टिप्पणी नहीं: