रविवार, 16 जनवरी 2022

प्रेम

प्रेम

प्रेम ...क्या है...?? केवल शव्द..? केवल भाव...? या फिर... एहसास...? 

सच कहूँ तो...प्रेम ना तो कोई शब्द है... ना भाव है... और ना ही कोई एहसास है... कि मन में उठा और लिख कर व्यक्त कर दो....!!

प्रेम एक शब्द नहीं मन के वो अव्यक्त से व्यक्त भाव है ...जिनको लिखना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है... मतलब प्रेम को शब्दों की परिधि में नहीं बाँधा जा सकता ...सच बात तो ये है  छोटा सा प्रेम शब्द अपने  अंदर इतने गहन भावों को समेटे हुए है जो बयां की परिधि से कोसो दूर है...
और फिर जो प्रेम परिभाषित हो जाये वो प्रेम कहाँ....कहाँ चलते हैं प्रेम में दायरे , सीमाएं , नियम और कायदे  ...प्रेम तो उन्मुक्त है बाबरा है दीवानगी है  ...!!

मानती हूँ कभी जरूरत पड़ती है  प्रेम को शब्दों की ...पर रूहानी पर हमेशा से अव्यक्त ही रह है... वो तो मूक है...फिर चाहे किसी से भी हो .. चाहे पशु पक्षी हों या मनुष्य..
प्रेम की मौन भाषा सभी को समझ आती है.. जिसने समझ लिया उसका जीवन प्रफुल्लता से परिपूर्ण हो गया... उसका रोम रोम सन्त हो जाता है जब प्रेम अनन्त हो जाता है 💐

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