ये स्वर्णिम तारों से गठी
एक पिता की चप्पल को देख
सोचती हूँ... मैं
लगता है किसी पिता की चप्पल हैं
जिसने बनाया होगा अपने बेटे को
डॉक्टर या इंजीनियर ...
अपनी जिंदगी लगा दी होगी
समझौते के तारों को जोड़कर
बच्चों ने इसी के बूते किया सफर
कलम से पेन तक का...
ये वही निशानी है...
जो पूजी जानी चाहिए मन्दिर में
पर अहो ...दुर्भाग्य
आँका जाता है इन्हें सिर्फ
फर्ज से
नाम दे दिया जाता है ...
जिम्मेदारी का
पर फिर भी ....वो पिता
खुश होगा...
जिसने बसूली है पूरी कीमत इन
चप्पलों से..
जिनको उसमे गांठा है...
मेहनत पसीने के स्वर्णिम तारों से
और
उभरती है चमक उसकी आंखों में
इन चप्पलों को देख
और कुछ सोचती हूँ मैं भी
कहीं तो इठलाती होंगी
ये चप्पल भी अपनी किस्मत पर
उसने भी तो किया एक सफर सुहाना
उस पिता के सपनों के साथ ..
नमन है हर पिता को
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