शुक्रवार, 25 जून 2021

पगली

सुनो...
आज बरसों बाद भी कही तुम छिपे हो मेरे अंदर...
तूमको बाहर निकालना चाहती हूँ... 
कुछ पल खुद से खुद को जीना चाहती हूँ...
कही कुछ गुम सा है उसे पाना चाहती हूँ...
कुछ और नहीं बस अब तुमको भूलना चाहती हूँ...
पर ये क्या ....

      आज भी खुद को खुद के कटघरे में खड़ा पाती हूँ..
         खुद अपने मुकदमे की पैरवी कर...
       खुद को एक दायरे में कैद पाती हूँ मैं...
          जानते हो क्यों...

                       क्योंकि ...तुमको भूलने के लिए भी तो...
                      तूमको ही याद करती हूँ मैं....
                       सच कहते थे तुम...
बड़ी पगली हो तुम....

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"


गुरुवार, 24 जून 2021

आड़ी तिरछी रेखा

आड़ी तिरछी रेखायें

लिखती नहीं हूँ... बस
अपनी कलम से..
 कुछ आड़ी तिरछी रेखाओं से 
उकेर देती हूँ कुछ अनकहे से जज्बात
कुछ दिल के एहसास
बस इसी उधेड़बुन में 
कुछ ताना बाना सा बुन
बन जाता है मेरा एक छोटा सा आशियाना
जहाँ में कभी रसोई में खाना बनाती
तो कभी ढेरों कपड़ों को धोती
उन्हें फैलाती और तहा कर समेटती
कभी आंगन बुहारती 
क़भी पाँव पसारे बैठती 
कभी घड़ी की टिक टिक का संगीत सुन 
खुश होती तो ...कभी
बार बार अनचाहे ही नज़रें
घड़ी को निहारती 
तो कभी दरवाजे पे खड़ी 
तुम्हारी राह निहारती
और कभी तुम संग घण्टों 
बतियाती ...कभी शिकवे तो
कभी उलाहने से अपना दुलार लुटाती
और तुम ...अपलक मुझे देखते 
मूक से बने और हौले से मुस्कुराते
यही तो है मेरी  कलम
जो बना देती है ...बिना हील हुज्जत के
अपनी आड़ी तिरछी रेखाओं से 
मेरे अहसासों का घर 
और मैं खुश हो विचरने लगती हूँ
सपनों की दुनिया में...

डॉ नीलम गुप्ता  "नीरा"

जिन्दगी और लम्हे

जिन्दगी
जिन्दगी के उन लम्हों को कैद करना चाहती हूँ....जो हंसाते है और कभी कभी रुलाते हैं... सच कहूँ तो लम्हे तो लम्हे हैं  जब भी याद आते हैं एक जिंदगी दे  जीते हैं एक उम्मीद एक ताजगी ...  वक्त गुजरता है पर वक्त के साथ हर लम्हा खुशगवार सा लगने लगता है... 
कभी सोचा है उन लम्हों के बारे में...जो कभी आँखों के कोर नम कर गए....और अपनी याद छोड़ गए... घटा सी घिर आयी ...उन लम्हों को भी कैद करना चाहती हूँ... अपने आगोश में भरना चाहती हूँ...
आप भी सोच रहे होंगे ...कितनी बेबकूफी भरी बात कर रही हूँ... कौन याद करता है ऐसे लम्हों को ...जो हमारी जिंदगी के कुछ पल या कहूँ वक्त ही खराब कर गए....
पर आप थोड़ा नजरिया बदल कर सोचिए... अगर आपकी जिंदगी में वो लम्हे या पल या वक्त नहीं आता तो आप अपने इरादे कैसे मजबूत करते ....कैसे जान पाते कि जिन्दगी चल रही है  .सच कहूँ तो उतार चढ़ाव ना हों तो जिन्दगी क्या है... अब सूरज को ही देखो ना हर रोज  अंधेरे का सामना करता है फिर उग जाता है नई ऊर्जा के साथ...
और हाँ एक बात और... आज जब आप बीते हुये उदासी भरे लम्हों को याद करते हो तो एक मुस्कान तो चेहरे पर आ ही जाती है...और दे जाता है वो गमगीन लम्हा भी एक सीख... मिल जाता है एक काश का साथ और आगे बढ़ने की ऊर्जा ... तो बस जिंदगी तो जिंदगी है चलती ही रहेगी...इन प्यारे से लम्हों के साथ...फिर मिलूँगी..

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

बुधवार, 12 अगस्त 2020

नज़र ankur

उसके चले जाने के बाद 
जिंदगी की हर बात सुलझ गई 
उसने सामने आकर नक़ाब  क्या हटाया
 जिंदगी फिर से उलझ गई ।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
        अंकुर गुप्ता

सोमवार, 3 अगस्त 2020

निन्दा

" निन्दा "...एक ऐसा शब्द ..जिसे सुनकर ... मन को विचलित करने वाला भाव मन में  आता है...
परन्तु अगर हम स्वयं किसी की निन्दा करें तो आनन्द भी बहुत आता है...ये दोनों ही बातें  अलग हैं ....परन्तु ये एक स्वभाविक प्रक्रिया है....
परन्तु अगर हम दूसरे दृष्टिकोण से सोचें तो... निन्दा  के भाव ही बदल जायेंगे ...हमारी विचारधारा का रूख ही बदल जायेगा ....
बस सोचने की बात सिर्फ इतनी है...कि कोई भी हमारी निन्दा क्यों  करता है....कुछ तो विशेष है ना....हम में ....उससे
तभी तो वो अपने अमूल्य समय में हमारे बारे में सोच रहा है...कहीं ना कहीं हम उसके दिल दिमाग में  समाये हुए हैं ..दूसरी बात...किसी ना किसी मामले में अवश्य ही  हम उससे क्षेष्ठ हैं ....तभी तो उस पर हमारा कब्जा है...
फिर नाराजगी कैसी ....हम भी खुश रहें ...वो भी खुश रहे....बस जरा सी सोच बदली ...मायने बदल गये....
( एक बार सोच कर तो देखिए )

# नीलम " नीरा "

शनिवार, 1 अगस्त 2020

उपेक्षा -सुभद्रा कुमारी चौहान

इस तरह उपेक्षा मेरी,
क्यों करते हो मतवाले!
आशा के कितने अंकुर,
मैंने हैं उर में पाले॥

 विश्वास-वारि से उनको,
मैंने है सींच बढ़ाए।
 निर्मल निकुंज में मन के,
रहती हूँ सदा छिपाए॥

 मेरी साँसों की लू से,
कुछ आँच न उनमें आए।
 मेरे अंतर की ज्वाला,
उनको न कभी झुलसाए॥

 कितने प्रयत्न से उनको,
मैं हृदय-नीड़ में अपने,
बढ़ते लख खुश होती थी,
देखा करती थी सपने॥

 इस भांति उपेक्षा मेरी,
करके मेरी अवहेला,
तुमने आशा की कलियाँ
 मसलीं खिलने की बेला॥

कलह-कारण -सुभद्रा कुमारी चौहान

कड़ी आराधना करके बुलाया था उन्हें मैंने।
 पदों को पूजने के ही लिए थी साधना मेरी॥
 तपस्या नेम व्रत करके रिझाया था उन्हें मैंने।
 पधारे देव, पूरी हो गई आराधना मेरी॥

 उन्हें सहसा निहारा सामने, संकोच हो आया।
 मुँदीं आँखें सहज ही लाज से नीचे झुकी थी मैं॥
 कहूँ क्या प्राणधन से यह हृदय में सोच हो आया।
 वही कुछ बोल दें पहले, प्रतीक्षा में रुकी थी मैं॥

 अचानक ध्यान पूजा का हुआ, झट आँख जो खोली।
 नहीं देखा उन्हें, बस सामने सूनी कुटी दीखी॥
 हृदयधन चल दिए, मैं लाज से उनसे नहीं बोली।
 गया सर्वस्व, अपने आपको दूनी लुटी दीखी॥