" निन्दा "...एक ऐसा शब्द ..जिसे सुनकर ... मन को विचलित करने वाला भाव मन में आता है...
परन्तु अगर हम स्वयं किसी की निन्दा करें तो आनन्द भी बहुत आता है...ये दोनों ही बातें अलग हैं ....परन्तु ये एक स्वभाविक प्रक्रिया है....
परन्तु अगर हम दूसरे दृष्टिकोण से सोचें तो... निन्दा के भाव ही बदल जायेंगे ...हमारी विचारधारा का रूख ही बदल जायेगा ....
बस सोचने की बात सिर्फ इतनी है...कि कोई भी हमारी निन्दा क्यों करता है....कुछ तो विशेष है ना....हम में ....उससे
तभी तो वो अपने अमूल्य समय में हमारे बारे में सोच रहा है...कहीं ना कहीं हम उसके दिल दिमाग में समाये हुए हैं ..दूसरी बात...किसी ना किसी मामले में अवश्य ही हम उससे क्षेष्ठ हैं ....तभी तो उस पर हमारा कब्जा है...
फिर नाराजगी कैसी ....हम भी खुश रहें ...वो भी खुश रहे....बस जरा सी सोच बदली ...मायने बदल गये....
( एक बार सोच कर तो देखिए )
# नीलम " नीरा "
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