आड़ी तिरछी रेखायें
लिखती नहीं हूँ... बस
अपनी कलम से..
कुछ आड़ी तिरछी रेखाओं से
उकेर देती हूँ कुछ अनकहे से जज्बात
कुछ दिल के एहसास
बस इसी उधेड़बुन में
कुछ ताना बाना सा बुन
बन जाता है मेरा एक छोटा सा आशियाना
जहाँ में कभी रसोई में खाना बनाती
तो कभी ढेरों कपड़ों को धोती
उन्हें फैलाती और तहा कर समेटती
कभी आंगन बुहारती
क़भी पाँव पसारे बैठती
कभी घड़ी की टिक टिक का संगीत सुन
खुश होती तो ...कभी
बार बार अनचाहे ही नज़रें
घड़ी को निहारती
तो कभी दरवाजे पे खड़ी
तुम्हारी राह निहारती
और कभी तुम संग घण्टों
बतियाती ...कभी शिकवे तो
कभी उलाहने से अपना दुलार लुटाती
और तुम ...अपलक मुझे देखते
मूक से बने और हौले से मुस्कुराते
यही तो है मेरी कलम
जो बना देती है ...बिना हील हुज्जत के
अपनी आड़ी तिरछी रेखाओं से
मेरे अहसासों का घर
और मैं खुश हो विचरने लगती हूँ
सपनों की दुनिया में...
डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"
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