शुक्रवार, 25 जून 2021

पगली

सुनो...
आज बरसों बाद भी कही तुम छिपे हो मेरे अंदर...
तूमको बाहर निकालना चाहती हूँ... 
कुछ पल खुद से खुद को जीना चाहती हूँ...
कही कुछ गुम सा है उसे पाना चाहती हूँ...
कुछ और नहीं बस अब तुमको भूलना चाहती हूँ...
पर ये क्या ....

      आज भी खुद को खुद के कटघरे में खड़ा पाती हूँ..
         खुद अपने मुकदमे की पैरवी कर...
       खुद को एक दायरे में कैद पाती हूँ मैं...
          जानते हो क्यों...

                       क्योंकि ...तुमको भूलने के लिए भी तो...
                      तूमको ही याद करती हूँ मैं....
                       सच कहते थे तुम...
बड़ी पगली हो तुम....

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"


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