बेतकल्लुफ सा सफर मन का
आज दो दिनों के बाद...
कुनकुनी सी धूप निकली ..बस रोक ना पाई स्वयं को..
आ गयी हाथ में चाय का प्याला थामे टेरिस पर...
कल दिनभर बारिश और हवाएं आंख मिचौली सी करती रही
तभी आज हर तरफ घुला घुला सा लग रहा है...सड़कें और पेड़ पौधे सब चमक रहे थे....
मैं भी रोक ना पाई खुद को और खड़ी हो गयी टेरिस पर...
मेरा खड़ा होना क्या था ...मानो मन को तो जैसे छूट मिल गयी भागने की
लाख रोको पर कहाँ मानता है... उद्दंड सा...चल ही देता है..
यादों की वादियों में अठखेलियाँ करने..
सच उस दिन भी ऐसी ही तो धूप थी जब हम दोनों ...
आमने सामने बैठे बेपरवाह से अपनी ही बातें कर रहे थे ...
एक उम्र होती है जब दीन दुनिया से बेखबर अपनी ही राहें होती है..
एक ऐसा ही तो सफर था वो...
अनजान एक दूसरे से...पर लगा ही नहीं कि पहली मुलाकात है..
सभी तो चर्चे हुए...बिलकुल बेपाक बेफिक्र
शायद यूँ ही होती होगी मजबूत रिश्तों की शुरुआत तब यही लगा
वक्त बीतता गया...
हमारी बातें होती रहीं...हर मसले पर
जब भी वक्त होता हम मिलते और पढ़ते एक दूसरे को..
तब लगता था जिन्दगी की हर समस्या का हल बहुत सरल है..
तक तक अनजान थे जिन्दगी से...पहचान ही कहाँ हुई थी जिन्दगी से...
पर उसके बाद ही जिन्दगी से मुलाकात शुरू हुई..
तब पता चला...
जिन्दगी में वक्त कहाँ एक सा रहता है...
वक्त बदला राहें बदली ...बहुत कुछ बदल गया ..
पर...
सफर जारी था जिन्दगी का
और....
हम वहीं के वहीं खड़े रहे ....
बस ...देखते रहे जिन्दगी को आगे बढ़ते हुए..
अब क्या ही कहूँ...
दिन पर दिन और साल दर साल यूँ ही बीतते गए...
यादें कभी धूमिल होतीं...तो कभी बिलकुल तरोताजा...
इसी कशमकश में साथ साथ अलग दिशाओं में ..
जानी पहचानी राहों में अनजान मुसाफिर से ...
वक्त के साथ समझौता कर बढ़ते ही रहे...
पर ये मन जिद्दी सा.. जब चाहे चल देता है... आज भी
अबोध बालक सा.. अपनी मन मर्ज़ी करता जब चाहें चल ही देता है यादों की हसीं वादियों में...
ओहो ...
ये क्या मन के पीछे मैं कहाँ चली..
बहुत से काम निबटाने है... धूप भी कुछ गहरी होने लगी...
याद आया...चाय का प्याला..
बेस्वाद हुई चाय..पर मीठी तो थी ..
गालों पर गरम गरम दो बूंदे थी और
हाथ में ठंडी चाय...
अजब संयोग था...
अच्छा अब चलती हूँ... फिर मिलूँगी
# डॉ नीलम गुप्ता
" नीरा "