बुधवार, 9 फ़रवरी 2022

तुम्हारा ख्याल

सुनो....

खोजती सी इन आँखो में ..…
ख्याब कुछ पुराने हैं...
पर.... ख्याल 
आज भी तुम्हारे नए हैं..
वो सुबह की पहली किरन सा तुम्हारा चेहरा...
वो सर्द  दोपहरी  धूप सा कुनकुना अहसास तुम्हारा..
वो ढलती शाम सा तुम्हारा नजरें झुका कर मध्यम से चले जाना...
वो चाँदनी रात सा तुम्हारा जुल्फों को झटक कर हौले से मुस्कुराना....
है कहाँ पुराना वो तुम्हारा ख्याल ....
वो तो आज भी नया सा है....

# डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

फर्क

फर्क होता है ....
दोस्ती और प्रेम में 

प्रेम कितना भी प्रगाढ़ हो ....एक मुकाम पर ठहर सा जाता है ...चाहता होती  है कुछ नया पाने की  ...और वो नयापन ही प्रेम को फीका कर देता है..… प्रेम के वास्तविक रूप को कुरूप कर देता है.... रंग से रंगीन हो जाता है ....वो सुकुमार "प्रेम"
पर  वहीं दोस्ती...
दोस्ती का कोई मुकाम नहीं होता कोई चाहत नहीं होती बिलकुल स्वच्छंद.... जितने पायदान चढ़ो ..उतनी ही गहरी  ...हर रोज नई ऊर्जा से लबरेज ....बस निर्बाध निर्मल नदी सी  आगे बढ़ती जाती है...  कभी ठहरती नहीं... थमती नहीं... यही तो है मस्तीभरी मदमस्त करने वाली  "दोस्ती "

सच कहूँ...
जिंदगी के सफर में प्रेमी तो बहुत मिलेंगे... हर 
मोड़ पर साथ चलने का वादा करने वाले ...हमसफर बनने का वादा करके बीच मझदार में साथ छोड़ने वाले..
पर दोस्त बहुत कम...और जो भी दोस्त मिले कस कर थाम लेना उसका हाथ...दोस्त तो होते ही वो है जो कदमों को डगमगाने नहीं देते और डगमगाए कदम तो थाम लेते हैं ...गुजारिश इतनी ही है... साथ खुद भी ना छोड़ना ऐसे दोस्त का....
दोस्त मतलब....दो हस्तियों के मिलन ही दोस्त है... और दोस्तों से ही जन्नत है... जहाँ दोस्तों की महफ़िल जमती है... वहाँ सच में जन्नत ही तो होती है ☺️☺️

#डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

सोमवार, 7 फ़रवरी 2022

चप्पल

ये स्वर्णिम तारों से गठी 
एक पिता की चप्पल को देख 
सोचती हूँ... मैं

लगता है किसी पिता की चप्पल हैं
जिसने बनाया होगा अपने बेटे को
डॉक्टर या इंजीनियर ... 
अपनी जिंदगी लगा दी होगी  
समझौते के तारों को जोड़कर 
बच्चों ने इसी के बूते किया सफर 
कलम से पेन तक का...
ये वही निशानी है... 
जो पूजी जानी चाहिए मन्दिर में
पर अहो ...दुर्भाग्य
आँका जाता है इन्हें सिर्फ 
फर्ज से 
नाम दे दिया जाता है ...
जिम्मेदारी का
पर फिर भी ....वो पिता
खुश होगा...
जिसने बसूली है पूरी कीमत इन 
चप्पलों से..
जिनको उसमे गांठा है...
मेहनत पसीने के स्वर्णिम तारों से 
और
 उभरती है चमक उसकी आंखों में
इन चप्पलों को देख
और कुछ सोचती हूँ  मैं भी
कहीं तो इठलाती होंगी
ये चप्पल भी अपनी किस्मत पर
उसने भी तो किया एक सफर सुहाना
उस पिता के सपनों के साथ ..
नमन है हर पिता को 

डॉ नीलम गुप्ता " नीरा"

शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

मन का सफर

बेतकल्लुफ सा सफर मन का 

आज दो दिनों के बाद...
कुनकुनी सी धूप  निकली ..बस रोक ना पाई स्वयं को..
आ गयी हाथ में चाय का प्याला थामे टेरिस पर...
कल दिनभर बारिश और हवाएं आंख मिचौली सी करती रही 
तभी आज हर तरफ घुला घुला सा लग रहा है...सड़कें और पेड़ पौधे सब चमक रहे थे....
मैं भी रोक ना पाई खुद को और खड़ी हो गयी टेरिस पर...
मेरा खड़ा होना क्या था ...मानो मन को तो जैसे छूट मिल गयी भागने की
 लाख रोको पर कहाँ मानता है... उद्दंड सा...चल ही देता है.. 
यादों की वादियों में अठखेलियाँ करने..
सच उस दिन भी ऐसी ही तो धूप थी जब हम दोनों ...
आमने सामने बैठे  बेपरवाह से अपनी ही बातें कर रहे थे ...
एक उम्र होती है जब  दीन दुनिया से बेखबर अपनी ही राहें होती है..
एक ऐसा ही तो सफर था वो...
अनजान एक दूसरे से...पर लगा ही नहीं कि पहली मुलाकात है..
सभी तो चर्चे हुए...बिलकुल बेपाक बेफिक्र 
  शायद यूँ ही होती होगी मजबूत रिश्तों की शुरुआत  तब यही लगा
वक्त बीतता गया...
हमारी बातें होती रहीं...हर मसले पर
जब भी वक्त होता हम मिलते और पढ़ते एक दूसरे को..
तब लगता था जिन्दगी की हर समस्या का हल बहुत सरल है..
तक तक अनजान थे जिन्दगी से...पहचान ही कहाँ हुई थी जिन्दगी से...
पर उसके बाद ही जिन्दगी से मुलाकात शुरू हुई..
तब पता चला...
जिन्दगी में वक्त कहाँ एक सा रहता है...
वक्त बदला राहें बदली ...बहुत कुछ बदल गया ..
पर...
सफर जारी था जिन्दगी का 
और....
हम वहीं के वहीं खड़े रहे ....
बस ...देखते रहे जिन्दगी को आगे बढ़ते हुए..
 अब क्या ही कहूँ... 
दिन पर दिन और साल दर साल यूँ ही बीतते गए...
यादें कभी धूमिल होतीं...तो कभी बिलकुल तरोताजा...
इसी कशमकश में साथ साथ अलग दिशाओं में ..
जानी पहचानी राहों में अनजान  मुसाफिर से ...
वक्त के साथ समझौता कर बढ़ते ही रहे...
पर ये मन जिद्दी सा.. जब चाहे चल देता है... आज भी
अबोध बालक सा.. अपनी मन मर्ज़ी करता जब चाहें चल ही देता है यादों की हसीं वादियों में...
ओहो ...
ये क्या मन के पीछे मैं कहाँ चली..
बहुत से काम निबटाने है... धूप भी कुछ गहरी होने लगी...
याद आया...चाय का प्याला..
बेस्वाद हुई चाय..पर मीठी तो थी ..
गालों पर गरम गरम दो बूंदे थी और 
हाथ में ठंडी चाय...
अजब संयोग था...
अच्छा अब चलती हूँ... फिर मिलूँगी

# डॉ नीलम गुप्ता
" नीरा "

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2022

सुकून

सुकून

स्त्री आखिर स्त्री है...वो अनजाने घर को अपनाती है... हर रिश्ते में खुद को बांध लेती है रेशम की डोर बन ...  समेट लेती है सबको  अपने आँचल में....बन जाती है सेतु    मायके और ससुराल का... 
सच कहूँ तो.. ईंट और सीमेंट से बनी छोटा मकान या बहु मंज़िली इमारत ... स्त्री के पावन कदम के पड़ते ही घर बन जाता है...उसकी पायल की झंकार से आशियाना बन जाता है.... ममता स्नेह दुलार का नेह बरसाती है वो नाजुक सी स्त्री .... उसकी चूड़ियों की खनक जब खनखनाती है तो मोह लेती है सबका दिल ... तभी  तो स्त्री को गृहलक्ष्मी कहते हैं...
 इतना सब ...

पर चाहती क्या है वो स्त्री..बस थोड़ा सा सुकून....
पर क्या है.. उसका सुकून  ??
चलिए बताती हूँ.... क्या है स्त्री का सुकून

जब पति हौले से आकर कानों में कहे ....
आज तुम बहुत अच्छी लग रही हो..
बस इतना सा...सुकून

जब बेटा पेट भर खाना  खा लें..
वो ही है .उसका सुकून

और जब बेटी कहे माँ तुम बैठो...
आज खाना मैं बनाती हूँ...
बस यही थोड़ा सा...सुकून

जब देवर कहे प्यारी भाभी 
आज तो आप छा रही हो...
बस इतना सा.... सुकून 

जब ससुर कहे ..आज खाना खा कर
 मजा आ गया...
बस इतना सा.. सुकून

जब सास कहे...बस बहुत हो गया काम
अब थोड़ा आराम कर लो
बस इतना सा... सुकून

यही है स्त्री और यही है उसका सुकून 
बस थोड़ा सा सुकून 
और ...
दीवार बन जाती है ..घर
और ....
घर बन जाता है  स्वर्ग 
थोड़े से.....सुकून से 😊

डॉ नीलम गुप्ता " नीरा"

बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

अभिलाषा

चाहत थी मेरी ...
या...कहूँ 
नादान सी बेबकूफी... मेरी...
या हटी सी जिद्द ...
जब भी देखती हूँ..
सूरज को...
मचल उठता है.... मेरा ये चंचल मन
आज भी...
और पहुँच जाता है...नासमझ उम्र के मोड़ पर 

तब भी और अब भी
सोचती हूँ....
आगोश में भर लूँ सूरज को...
उसके उजाले को और रोशन कर दूँ..
उन तमाम बस्तियों को ...
जहाँ सूरज तो भरपूर निकलता है...
पर उजियारा नहीं होता...
 बस..
इसी उहा पोह में उलझी मैं...
चल पड़ी...
अपनी जिद्द की जिद्द पूरी करने...
और...
सांझ होते होते...
आखिर ...
मैंने... थाम ही लिया अपने सूरज को
 फिर ...पूछ भी लिया...
उससे...
क्यों करते हो इतनी चिरौरी मेरे साथ
कुछ ठहर के
गुलाबी मुस्कान के साथ ...वो बोला
हूँ तो सदा ही तुम्हारा
पर...
कोशिश और उम्मीद से
  पूरा ही मिलूंगा..
आधे अधूरे का क्या ही काम 
और.... हाँ
अब तुम जाकर जगा देगा ....
उन सोये हुए मनो को...
जहाँ...
मैं तो हूँ ...पर
मेरा उजियारा नहीं....

# डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

रिश्ते ...

देखो...समझो... जानो
 कई बार हम कुछ रिश्तों को कस कर थाम लेते हैं... अच्छा ही है ना...जब तक रिश्ते थामे जाएं ...रिश्तों को बचाया जा सकता ह बचा लेना चाहिए... पर...एक सीमा तक... क्योंकि ...कई बार हम अकेले ही कोशिश करते हैं... रिश्तों को बचाने की...और हम टूटते जाते हैं... और फिर क्रम शुरू होता है टूटने से बिखरने तक का....हम बिखरते जाते हैं और इतना बिखरते हैं कि खुद को समेटना खुद के लिए मुश्किल हो जाता है... अंत में हमारा अस्तित्व ही नहीं बचता....

 बस यही है रिश्तों को समेटने और बिखरने की दास्ताँ... 
सच कहूँ तो बहुत जरुरी है रिश्तों को निभाना... और रिश्तों को बचाना भी ...कुछ हद तक रिश्तों को बचाने के लिए स्वयं का झुक जाना भी...पर जब रिश्ते चुभने लगे बहुत दर्द देने लगे टीसने लगे तो उनको छोड़ना ही बेहतर है.... दर्द तो होता है ... पर नासूर नहीं बनेगा...वक्त के साथ सब सिमट जाता है... खत्म तो नहीं होता कुछ भी...
अब पेड़ों से पतझड़ में जब पत्ते गिर जाते हैं ..निशां तो रह ही जाते हैं... एक बात और ये भी गौर करने वाली है कि ... उन जगहों पर फिर कोई दूसरा पत्ता नहीं उगता...

 यही प्रकृति का शाश्वत नियम है....जिसको जाना है वो जाएगा ही....जाने वाले को कौन रोक सका... 
रिश्ते लगाव तक ही रखिये घाव तक नहीं... घाव नासूर बन जाता है और लगाव मरहम.... 😊
डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"