शनिवार, 16 मई 2020

जिसको उसने जन्म दिया-राजन विघार्थी

जिसको उसने जन्म दिया
उसने उसको बाजार दिया
   जब जी चाहा मसला कुचला 
     जब जी चाहा दुत्कार दिया
        कभी उसके जज्जबातों से खेला
          कभी उसके जज्जबातों को मार दिया
             कभी दुख,पीड़ा,बेबसी,बेचैनी दी
              कभी-कभी तो प्यार दिया
               कभी सती बता विधवा जला दिया
                  कभी भृूण में उसको मार दिया//
        इसमे उसकी भी कुछ गलती थी
       उसने माना किस्मत मे यही लिखा था
     क्योंकी बचपन से उसने यही सिखा था
   लाचार रहीं होंगी कुछ 
कुछ ने खुद काला ईतिहास लिखा///
             आंसू को हथियार बनाना था
     बेटे को ढाल ,बेटी को तलवार बनाना था
     क्यों विरोध नहीं किया उसने
    जब आग में जलकर मरजाना था////
  
   राजन विघार्थी
11/08/17
       

खुदा किधर है-राजन विघार्थी

१.न हमे खबर है,न तुम्हें खबर है
   किधर शान्ति है,शुकूँ किधर है
       हम तनहां यहां है,तनहां जहां है
          मैं ढूंढ रहा हूं, खुदा किधर है
             उसकी हैं सन्तान है यहां सब
               कया? उसे पता है ,उसे खबर है
                 सब ढँढ रहे अपना-२ मकसद
                    यहाँ खुदा की किसे फिकर है///
2.हर दफा सोचता हूँ, कई दफा सोचता हूँ,
   कोई तो करे मेरे साथ वफा,सोचता हूँ,
आप या कोई और ,मुझे कुछ समझता ही नहीं
यहां हर कोई खुदा है या हिस्सा है उस खुदा का,
 जाने क्यों मैं ऐसा सोचता हूं//////

3.जाने पहचाने चेहरे हैं सब,
    फिर मैं क्यों अनजाना रहता हूँ,
         कहते हैं ,यहां तो सब अपने हैं
            फिर क्यों बेगाना लगता हूँ
               खुली किताब है जीवन की
                  फिर क्यों अफसाना लगता हूँ//////
राजन विघार्थी
10/08/17
   
  
 

जलजला-राजन विघार्थी

मेरे दिल की दीवारों को हिलाया है,
जब-जब तेरी यादों  का जलजला आया है,
कुछ सवप्न खण्डहर हुए ,
कुछ  अहसासों का मलबा निकला 
नवनिर्माण को अपनों का फिर कुनबा निकला /
             दिल की दीवारें कमजोर हैं
            फिर भी यहां जलजले आते हैं
           कभी उनकी यादें आती हैं
       कभी वो खुद चले आते हैं/
वो जलजला सी मेरी जिन्दगी मे आती है
सारीरिक,मानसिक,आर्थिक,सामाजिक ढांचा
हिलाती है,
मैं मलबा समेटता रहता हूँ,
वो भाटा सी वापस चली जाती है//
   राजन विघार्थी
27/07/17

ठिकाना-राजन विघार्थी

1.कुछ लोग ढूंढ रहे हैं ठिकाना
ठिकाने लगाने के लिए,
कुछ लोग ढूंढ रहे हैं ठिकाना
पास आने के लिए,
सबको मिल गया मेरा ठिकाना
फिर न मैं रहा ,न मेरा ठिकाना.
२.हर ओर रवानी है
जोश है,जजबा है,जवानी है
औरों से अलग अपनी कहानी है
आधुनिक जीवन शैली है
पर आंखो में अभी-भी पानी है
सब सलामत है,
क्योंकी खुदा की निगेहबानी है /
३.क्यों गिड़गिड़ा रहे हाथ फैलाकर
क्यों वक्त अपना बरबाद करते हो
हथौड़ा उठाओ मर्जी की मूरत बना लो
क्यों पत्थरों से बात करते हो.......
              राजन विघार्थी
           १४/०६/१७

नकाब नही रखता-राजन विघार्थी

१..जमीन जे जुड़ा हूँ,आसमान का ख्वाब नहीं रखता
एक ही चेहरा है अपना,मैं चेहरे पर नकाब नहीं रखता/
२..गिरकर उठना आदत हो गयी है मेरी
गिरने पर मैं आह नहीं करता
सच्चा आशिक हूँ मैं
जीत या हार की परवाह नही करता///
३..शहीद हुए गम नही,
वरदी पहनी ही थी कुर्बान होने के लिए,
तुम भी अब अपनी गिनती सुधार लो
काम आयेगी जनाजे गिनने के लिए,
तब आखिरी आप्सन होगा मौत या सरेन्डर
करने के लिए////
राजन विघार्थी

मैं प्यार का मरीज हूँ-राजन विघार्थी

मैंने घेराबन्दी कर रक्खी है
तुम मुझे दगा नही दे सकती हो/
मैं प्यार का मरीज हूँ
मैं जिन्दगी चाहता हूँ
तुम मुझे मौत की दवा नहीं दे सकती हो/
मैं इकबाले जुर्म-ए इश्क
कबुल करता हूँ
तुम मुझे कोई और सजा दे सकती हो//
तू जलती आग है,
तुझसे नफरत का धुवाँ उठता है
और धुवें में मेरा दम घुटता है
मैं प्यार का मरीज जिन्दगी चाहता हूँ
तुम मुझे प्यार की हवा दे सकती हो////
           राजन विघार्थी
           28/04/17

वक्त बदलता है-राजन विघार्थी

2..वक्त बदलता है ख्वाब बदल जाते हैं
समय के साथ जनाब बदल जाते हैं
हमारा सवाल तो वही रहता
वक्त के साथ जवाब बदल जाते हैं//
              3..लोग जब रह-रहकर जख्म कुरेदते हैं
             चीख और दर्द का ढेर निकलता है
              मनमसोस कर रह जाता हूँ जब
           मेरे सुर्ख लबों से इक  सेर निकलता है//
   
राजन विघार्थी
26/04/17