शनिवार, 16 मई 2020

प्यार में डूब गये-राजन विघार्थी

तूफां न कुछ बिगाड़ सके अपना
हम दरिया के पार भी खूब गये
हर आपदा से बचा लिया खुदको
बस किसी के प्यार में डूब गये//
तूफानों से तेज दौड़े,हम हिरनों से भी जीत गये
दो पल किसी का इन्तिजार कर लिया
और हम सारी दुनिया से पीछे छूट गये
फिर न जाने क्यों वे हमसे रूठ गये
जिनके लिए दुनिया से छूट गये
वो रूस्खत हो गये हमारी दुनिया से
धीरे-धीरे हम अन्दर से टूट गये//////////  ////
 राजन विघार्थी

कब शाकार बनूँ-राजन विघार्थी

मैं हवा में उड़ता एक पतिंगा हूँ
पता नहीं कब
चिड़ियों का शिकार बनूं
पता नहीं कब
बच्चे  बांध लें मुझको डोरी पर
कब उनके खेलों का संसार बनूं
पता नहीं कब
मिल जाये मौका फिरने को दिया के चारो ओर
पता नहीं कब
मै अपनी ही मिटती दुनिया का अंगीकार बनूं
पता नहीं कब
ले जायें चींटी मेरे पंखो को अपने महलों पर
पता नहीं कब
बहा दे मुझको खुदा ही अपनी लहरों पर
एक पंख रह जाये गांवो पर ,एक पंख मिले शहरों पर
पता नहीं कब
मिल जाये दीपक,कब अग्नि का आहार बनूं
आज तो एक मिथ्या हूँ
पता नहीं कब शाकार बनूं///////
दिल की बात बाइ राजन विघार्थी
Written---16/11/13

प्यारा स्कूल-राजन विघार्थी

तितली सा रंग-बिरंगा होता
अपना प्यारा-न्यारा स्कूल
मम्मी सी मैडम होतीं
पापा से टीचर होते 
सपनों से भी ज्यादा सुन्दर,तब अपने फीचर होते
रंग-बिरंगी किताबें होती, पढ़ना भी खेल होता
मैं इंजन बन जाता,बच्चों का रेल होता
मैडम डृाइवर बन जाती ,टीचर टीटी होते
हाथ फ्लैग बन जाते,मुंह अपने सीटी होते
छुक-छुक अपनी गाड़ी चलती,पों-पों हारन बजता
बात-बात पे पप्पी मिलती,जब कोई गलती करता
फिर सब कालेज को दौड़ लगाते
स्कूल से कोई न डरता
अभी तक तो ऎसा हुआ नही
काश कोई तो ऎसा करता///////////
 राजन विघार्थी
Written 11/03/15 to gullu gupta class ukg  barra- kanpur nagar

होली का हुड़दंग्य-राजन विघार्थी

गुलाल लगा कर भाग रहे थो,बच्चे खुल्लम- खुल्ला
चुुपके-चुपके पका रहीं थी,दादी माँ रसगुल्ला
सबकोइ भागम-भाग रहा था
कोइ सो रहा -कोइ जाग रहा था
न अम्मा  ने रोका,न पापा ने टोॆका
जो मिल गया बस पिचकारी भोका
सब भाग-भाग रंग लगा रहे थे
देके इक दूजे को धोॆखा
इतनो में रसगुलले की खुसबू आयी
सबने घर की दौड़ लगायी
इस भाग दौड़ में,न हुई किसी की हार,न हुई किसी की जीत 
बैठा देख रहा अभिजीत
फिर स्कूल शिवानी आयी,
भर कर  टिफिन रसगुललेे लायी
सारे रसगुलले मैंडम खा  गयीं
सर के हिस्से चासनी आयी
दिल की बात बाइ राजन विघार्थी
written-11/03/2015

आयी होली-आयी होली-राजन विघार्थी

आयी होली-आयी होली,
सबके घर सज रही रंगोली
कोई रंग से कोई आटे से,
कोई गोली से बना रहा रंगोली
जल गयी होली- जल गयी होली
कोई होली ताप रहा है,कोई सरपट भाग रहा है
कोई रसगुल्ले के खातिर अपना मुंह तो नाप रहा है//
घर पर बैठी है खुशिया,
बनती देख रही है गुझिया
भाग-भाग कर गोरे लाल,
लगा रहा सबको गुलाल
किसी के गाल किसीके बाल,
किसीका चेहरा हो गया लाल
दिब्यांसी,पृियांसी,अन्तिमा वैशाली 
घर पर बैंठी थी खाली
अंकिता,खुशी घूंम रहीं थी, लेके पकवानों की थाली
और चाहिए उपासना ,पृीती माँ से बोलीं
आस्था निहारिका निहार रहीं थी
जाती हुई बच्चों की टोली///////
                                   राजन विघार्थी
Dedicated to खुशी गुप्ता Class second barra kanpur nagar

जीवन पथ पर-राजन विघार्थी

ओ माँ मुझे  सहारा दे 
अब हम राहें भटक गये हैं
कितनी तेजी से बढ़े कदम थे
चलते-चलते अटक गये हैं
देवदारू पर चढ़ना था
चने पे ही हम लटक गये हैं
ओ माँ मुझे सहारा दे
अब हम राहें भटक गये हैं//
                           कब छोड़ी थी मेरी अंगुली
                           तब से अबतक चलते आये
                           एक बार नहीं
                           सौ बार भी गिरकर उठते 
                                  आये//
जिस पर चलते हैं
वो उतनी अच्छी लीक नही हैं
बहुत पुरानी लीक है वो तो
उस पर चलना ठीक नही है
मुझको एक नई लीक दिखा दे
पथ कोई अब ठीक बता दे    
अन्दर से हम टूट चुके हैं 
फिर से वह विश्वास जगा दे//     
  
             सीस तेरा न झुकने पाये   
              मान तेरा न मिटने पाये  
              इन सबकी रक्छा के खातिर
              मुझको मिटने कि शक्ति दिला दे
ध्यान न मेरा हटने पाये
ऎसी भक्ती शक्ती दिला दे//
              अब मुझको एक नई लीक दिखा दे
               जिस पर अब बढ़ते जायें
                चलते जायें-चलते जाये 
                पथ कोई ऎसा ठीक दिखा दे////////
(राजन विघार्थी)
                
Written-16-08-13

मानव विकास-राजन विघार्थी

स्वार्थ के लिए अपने 
मानव ने देखे कितने सपने
मानव अपने कितने सपने सच करता है
जंगलों का विनाश करता है
अपने ही नाश के दिनों को और पास करता है/
    जंगल को काट रहा है
विनाश की चिट्ठी ,बांट रहा है
विग्यान के दौर में,विकाश की दौड़ में
सब कुछ जान रहा है 
विनाश के पथ पर भाग रहा है/
                      विकाश के नाम में
                     विग्यान के पैगाम में 
                 सोचा था
                        फस्ट आऊँगा मैं 
                       पर
                    फेल हो गया इक्जाम में///
                
राजन विघार्थी