सोमवार, 13 जुलाई 2026

मेरा सफरनामा 💕

ए सुनो...

चलो मिलवाती हूँ.. आज मैं अपनेआप से आपको..
(1986... से....2026 )
 वो भी क्या दिन थे अल्हड़ से गुस्ताखियां थीं... नादानियां थीं... वो बांकपन... उन्मुक्त... बेपरवाह सी..... मैं 
    सच कहूं बड़े ही मस्त अजब गजब दिन थे ... वो वेपाक बातें...बिल्कुल निश्चिंत...बचपन वाले दिन .... 
     कब और कहां फिसल गए ...कहां खो गए.... वो बचपन वाले हंसी पल....
     समय के साथ कुछ नए बंधन बंधे ... फिर हौले से  जिम्मेदारियों ने हाथ थामा... पता ही नहीं चला ....कब जिम्मेदारियां   बड़े हक से लिपट गई....   और वक्त धीरे धीरे फिसलता गया....
      समय के साथ कदम ताल मिलाते हुए चलती गई ...बस चलती गई....आइने के सामने एक दिन निगाह पड़ी खुद पर.... जिम्मेदारियों के कुछ निशाँ चेहरे पर  दिखे .... आँखे मिचमिचाते हुए फिर से एक बार ठीक से देखा खुद को .... कहां से कहां तक का सफर तय हो गया ...पता ही नहीं चला....
      जब जिन्दगी के सफर में वो मुकाम आया जब अपने लिए कुछ वक्त मिला ... शायद वो भी इसलिए कि सभी  अपने अपने सफर में चल दिए .....अपनी मंजिल के लिए...
     तब याद आया कहां गए वो दिन....कहां खो गए या फिर मैं ही कही रखकर भूल गई....आज भी ढूँढ रही हूं ....वो बीते लम्हे...वो खिलखिलाती हंसी.... वो अल्हड़ बचपन....उम्र की उस दहलीज पर आकर  भी जीना चाहती हूं वो बीते पल... करना चाहती हूं वो गुस्ताखियां.... एकबार फिर से निश्चिंतता से दौड़ना चाहती हूं.... इसी उधेड़ बुन में आँखों का काजल हल्का सा फैल कर गालों तक आ गया ... एक रेखा सी खिच गई 
    अरे ये क्या.... तुरंत काजल ठीक किया ... और खुद की खुद ही नानी बन बोली.... पागल हूं क्या.... इतना लंबा सफर पार किया ...वो भी हंसी खुशी ...बहुत से रिश्ते बांधे और निभाए  बड़ी सहजता से.... सच कहूं तो जब सभी मेरे इर्द गिर्द घूमते थे अपनी जरूरतों के लिए तो मैं ही तो बड़े गर्व का अनुभव करती थी.... और खुद को किसी बेताज बादशाह से कम नहीं समझती थी.....सब कुछ तो अच्छा ही था उतार चढ़ाव का नाम ही जिन्दगी है.....
      फिर भी ....बचपन जीना चाहती हूं 
अब तो सोचती हूं....मेरे बाद मेरी आंखे भी शायद खुली रहें.... उन नादानियों भरे अल्हड़ दिनों के इन्तजार में...
  ये भी एक सफ़रनामा है... मेरा ही नहीं शायद सभी का.... वक्त के साथ समझौता करना ही जिंदगी है.....

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा "

शनिवार, 11 जुलाई 2026

वक्त

सुनो....
एक लंबे अंतराल बाद 
घर का वो कोना देखा जिसमें दबी हुई थी बहुत सी यादों की कब्र... बहुत बार चाहा ... और सोचा भी ... पर कुछ जिम्मेदारी और कुछ बेफिक्री.... पर सच कहूं तो 
        ना तो चाहने से कुछ होता है और ना ही सोचने   से.... पर वक्त तो वक्त है ना...चलता ही चला जाता है अपनी रफ्तार से... हमें ही लगता है कि कभी वक्त बहुत तेजी से गुजरता है तो कभी धीमी रफ्तार से....
       पर एक बात तो है वक्त कैसे भी गुजरे पर बहुत कुछ सिखा जाता है कभी कभी तो हिम्मत और हौसले बुलंद कर जाता है.... बस वक्त के साथ चलते चलते कुछ पल जवान हुए तो कौतूहल वश  घर के कोने  में रखी गठरी खोल ही ली.... या यूं कहूं कि जब जिम्मेदारी का बोझ कम हुआ तो कुछ पल अपने लिए जीने का मन कर गया....इसी में 
   परत दर परत  यादें रंगीन होने लगी बचपन की अठखेलियाँ  लुका छिपी  युवा मन की तरंगे  मन में उठते अनेक सवाल जवाब .. अपनी नादानियां.. कुछ कोर नम हुए ...  वो तुम्हारा स्नेहपत्र  कांपते हाथों से जैसे ही उठाया ... एक पल लगा वक्त पीछे बहुत पीछे चला गया.... होठों पर एक स्निग्ध मुस्कान आई अपनी नादानियों पर और दो बूंद गालों पर बेफिक्र सी चल दीं .....इनको कहां जरूरत होती है किसी से इजाजत की
      आज मैं सोचती हूं हमने कितना अच्छा वक्त गुजारा... निश्लता का वो दौर था स्नेह पत्रों का जिसे हम कभी भी खोल कर पढ़ लेते हैं जी लेते हैं गुजरे वक्त को  और हँस लेते हैं अपनी ही नादानियों पर....
    पर आज कहां है वो यादों के जीवंत रंगीन पन्ने  ..  आज तो बस मोबाइल है जरा सा हैंग हुआ और अब डिलीट....एक दुनिया सिमट गई जरा सी मशीन में.....
    आज  पुरानी किताबों में रखे वो गुलाब जवाँ नहीं होते.....

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

मेरा बचपन

कोई लौटा दे मेरा बचपन 
जब मैं छोटा था बुनता था ख्याब बड़े 
उन ख्वाबों के ताने बाने में बना लेता था एक रंगीन दुनिया
जहां सिर्फ और सिर्फ खुशियां ही होंगी 
सोचा करता था मां की गोद से निकल
उड़ूंगा तोड़ लाऊंगा हसीं सितारे ... बस बड़ा हो जाऊं...
दिन भर ढेरों सपने बुनता ....

समय बीता वक्त बीता..साल महीने दिन रात और ऋतुएं बीती...
और हुआ मेरा भी मन चाहा...
 एक दिन भगवान के द्वार पर  हुई मेरी सुनवाई 
मैं बड़ा हो गया....
अच्छा लगा ...लगा सोचने  अब मैं उड़ सकता हूं 
ना कोई बंधन ... ना कोई पाबंदी खुद का राजा खुद..…
बस जीने लगा अपनी सपनों की रंगीन दुनिया में.. मैं खुश था मगन था खुद में..

पर...फिर समय बीता वक्त बीता...साल महीने दिन रात  और ऋतुएं बीती...
अब में था... यथार्थ के धरातल में...
रूबरू हुआ दुनिया से... फिर मिला जिम्मेदारियों से... यारों से ..अपनों से बेगानों  से...तब 
लगा किसी ने पटक दिया आसमान से जमीं पर..तब देखी  सपनों की दुनिया की काली तस्वीर...कांप उठा मेरा रोम रोम..
मै चिल्लाया ... मां कहां है ...छिपा ले अपने आंचल में... छांव दे दे अपने आंचल की ..सहला दे मेरे उलझे बालों को... एक चपत तो लगा दे मेरे गालों में... डांट ले मार ले मां .. मैं चुप चाप बस तेरे आंचल में लिपटा रहूंगा.... 
बस एक बार मेरा बचपन लौटा दे कोई...
मैं बिलखता रहा पर कौन सुनता मेरी...
क्योंकि....

वो समय बीत गया वक्त बीत गया साल महीने दिन राल ऋतुएं  सब बीत गए..... सब बीत गए... 
और जो बीत गया वो लौट कर नहीं आता...कभी नहीं 

डॉ नीलम गुप्ता  "नीरा"

पेड़ की प्रेम कथा

* पेड़  की  प्रेमकथा *
           =============   
देख रहे हो इस पेड़ को शान्त ..बिलकुल. शान्त..देखो बिलकुल हमारी तरह बनावट है इसकी ...
नीचे देखो एक साथ. ..ना तुम ...ना मैं ..."हम"...
कुछ समय साथ-साथ चलते रहे ...फिर अचानक से दो भागों में  बंट गये ....एक "तुम"... एक "मैं "....
फिर समय ..परिस्थिति ...जिम्मेदारी में उलझ कर...कुछ फासले हुए...
अगर मैं  ये कहूं बिलकुल इसी पेड़ की तरह ....तो अतिशयोक्ति ना होगी ...
एक अन्तराल बाद फिर कुछ पास आये...देखिए इस पेड़ को एक टहनी  को... ना जाने  कहाँ से आकर जोड़ रही है उन दोनों को....
एक डोर में दूरी बनाए हुए ...जुड़ से रहे हैं एक अनजान रिश्ते में .....और साथ-साथ चलने का सुखद एहसास...सीमा रेखाओं की परिधि में .....
पर कब तक...देखिए ना इस वृक्ष को... कुछ समय बाद .....समय ने पिर करवट ली.....नियति का फेर...
एक शाखा करीब आते आते दूर बहुत दूर हो गयी ...और.. फिर से ठूंठ बन गयी...
पर दूसरी  अनवरत एकाकी सी..  मूक...किन्तु  शान्त...अपनी धुन में आगे बढ़ती गयी  ..बढ़ती गयी ...
अन्त में हरा भरा खुशनुमा..माहौल बना कर...दूर क्षितिज मे समा गयी  ...छोड़ गयी  अपने निशां ....
देखो ना ध्यान से देखो....
क्या  मैं झूठ कह रही  हूं...या ये मेरी कोरी  कल्पना मात्र है...
ये  सच है...
और हां एक बात और बता दूं...जिससे फिर ये ना कहो बताया  नहीं  तुमने .....
ये कटु सत्य है...  पर यथार्थ है...इसे तो स्वीकारना ही पड़ेगा...
 वो ठूंठ मै हूं... जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा सानिन्ध्य पाने के लिए बार-बार तुम्हारे करीब आ रही है...और अन्त में यूं ही खाली हाथ... अस्तित्व को समाप्त कर विलीन हो जाती है नीले आसमान में ...
 और वृक्ष का दूसरी डाली ..तुम हो...अनेक झंझावतो को सहते...उसमें  रमते ...शान्त...सीधे ...अपने कार्यों में लिप्त ...अपनी अमिट छाप ..अपने  अस्तित्व की गरिमा को बनाए हुए ..विलीन हो जाते हो दूर क्षितिज में .....
कह रही  हूं ना मैं सच ....अब तुम ही बताओ क्या ये मेरी  कोरी कल्पना है....इसे तुमसे बेहतर कौन. जान सकता है...
ये यथार्थ है...कटु सत्य है...बस फिर ना कहना बताया  नहीं ....
इसके आगे और कुछ बचा ही नहीं  कहने को....और क्या कहूं... कुछ जुड़ाव सा... कुछ. लगाव सा हो गया है इस पेड़ से....जितनी बार देखती हूं...कुछ अपनत्व सा लगता है....
बस तुम देखो ना एक बार.....इस पेड़ को ध्यान से ...."मान लो ना मेरी  बात" 

    डॉ नीलम गुप्ता " नीरा"

रविवार, 24 अगस्त 2025

तेरा वक्त अच्छा है तू हमसे किनारा कर लेहम बुरे लोग हैं बुरे वक्त में काम आते हैं..!!

कुछ सवाल जवाबक्या पेड़ों को याद रहते हैं वो पत्तेजो छोड़ गए उन्हें पतझड़ मेंक्या आसमान याद करता होगा कभीटूट गए तारों कोफूलों को याद रहती होगी क्याउनकी सुगंधसूख जाने के बादयाद रखा होगा क्या चिड़ियों नेउस पेड़ कोजिसपे बनाया था कभी एक छोटा सा घरशायद नहींपर हम यादों से बने लोग थेकभी भी कुछ भी ना भूलने के लिए शापित😶..................हां याद रहता है सब कुछ जब टूटते हैं पेड़ों से पत्तेछोड़ जाते हैं अपने निशाँ,तभी तो...फिर उस जगह फूटती नहीं कोई नई कोपल... आसमान से टूटा हुआ तारा जोड़ देता है मन से मन के तारों कोउस तारे की रिक्तता हमेशा ही आसमान में बनी रहती है ....कभी गौर से देखो तो पर शायद ही कोई उस टूटन को महसूस करता हो... फूल कभी जुदा ही नहीं होते खुशबू से कभी देखो किताबों में रखे फूलों को... बरसों बाद भी अपने अंदर समाई सुगंध से महका देते हैं मन का एहसासों का कोना कोना... चिड़ियों का गहरा नाता है पेड़ो से...एक सुखद संसार उसी पेड़ से बना होता है उसका... तभी तो चूजों के चले जाने के बाद भी..... वो घोंसला तो छोड़ती है पर..पेड़ से जुड़ाव कभी नहीं छूटता ... सच कहा ...तुमने...हम यादों से बने लोग हैं.... शापित नहीं हैं....क्योंकि... यादें ही हैं जो हमें जीवित रखती हैं...एक उम्मीद ..एक आशा जगाए रखती हैं... अंतर्मन के कोने में...एहसासों में भावनाओं के समुंदर में...जीवित रखती है हमें ...कभी मरने नहीं देती.... हमको और हमारे अपनों को... वक्त को फिर से दोहराती हैं.... यादें... याद तो उन्हें भी रखती हैं ..जो जाते हैं हमें छोड़ कर... पर देखो ना... सखी यादें ही तो हैं जो हमें जिंदा रखती हैं... जीवंत रखती हैं...फिर उनको शापित कैसे कहूं...यादें अच्छी बुरी जरूर होती हैं... पर ज्ञान समझदारी जैसे अनमोल रत्न तो देती ही हैं... मुझे नहीं भूलना अच्छी बुरी यादों को...क्योंकि वक्त बदलता है...तभी तो कुछ यादें कभी जो अच्छी हुआ करती थी जिनमें कभी हम मुस्कुराए थे आज बुरी लगती हैं ... और कभी बुरी यादें...हमारी जिन्दगी बदल देती हैं.... और एक मुस्कान आ ही जाती है...सच यादें तो यादें हैं... अनमोल बहुमूल्य...उपहार स्वरूप...😘डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

कुछ सवाल जवाब

कुछ सवाल जवाब

क्या पेड़ों को याद रहते हैं 
वो पत्ते
जो छोड़ गए उन्हें पतझड़ में

क्या आसमान याद करता होगा कभी
टूट गए तारों को

फूलों को याद रहती होगी क्या
उनकी सुगंध
सूख जाने के बाद
याद रखा होगा क्या चिड़ियों ने
उस पेड़ को
जिसपे बनाया था कभी एक छोटा सा घर
शायद नहीं
पर हम यादों से बने लोग थे
कभी भी कुछ भी ना भूलने के लिए शापित😶

...............

...हां 
याद रहता है सब कुछ 
 जब टूटते हैं पेड़ों से पत्ते
छोड़ जाते हैं अपने निशाँ,

तभी तो...फिर उस जगह फूटती नहीं कोई नई कोपल...
 आसमान से टूटा हुआ तारा 
 जोड़ देता है मन से मन के तारों को
उस तारे की रिक्तता हमेशा ही आसमान में बनी रहती है ....कभी गौर से देखो तो
 पर शायद ही कोई उस टूटन को महसूस करता हो...
    फूल कभी जुदा ही नहीं होते खुशबू से 
 कभी देखो किताबों में रखे फूलों को...
 बरसों बाद भी अपने अंदर समाई सुगंध से महका देते हैं मन का एहसासों का कोना कोना...
 चिड़ियों का गहरा नाता है पेड़ो से...
एक सुखद संसार उसी पेड़ से बना होता है उसका... 
तभी तो चूजों के चले जाने के बाद भी..... 
 वो घोंसला तो छोड़ती है पर..पेड़ से जुड़ाव कभी नहीं छूटता ...
     सच कहा ...तुमने...
हम यादों से बने लोग हैं....
 शापित नहीं हैं....
क्योंकि... 
यादें ही हैं  जो हमें जीवित रखती हैं...एक उम्मीद ..एक आशा जगाए रखती हैं... अंतर्मन के कोने में...
एहसासों में भावनाओं के समुंदर में...जीवित रखती है हमें ...कभी मरने नहीं देती.... हमको 
और हमारे अपनों को... वक्त को फिर से दोहराती हैं.... यादें...
 याद तो उन्हें भी रखती हैं ..जो जाते हैं हमें छोड़ कर...
  पर देखो ना... सखी 
 यादें ही तो हैं जो हमें जिंदा रखती हैं... जीवंत रखती हैं...
फिर उनको शापित कैसे कहूं...
यादें अच्छी बुरी जरूर होती हैं... पर ज्ञान समझदारी जैसे अनमोल रत्न तो देती ही हैं...
 मुझे नहीं भूलना अच्छी बुरी यादों को...
क्योंकि वक्त बदलता है...तभी तो कुछ यादें कभी जो अच्छी हुआ करती थी जिनमें कभी हम मुस्कुराए थे आज बुरी लगती हैं ...
 और कभी बुरी यादें...हमारी  जिन्दगी बदल देती हैं.... और एक मुस्कान आ ही जाती है...
सच यादें तो यादें हैं... अनमोल बहुमूल्य...उपहार स्वरूप...😘

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"