मंगलवार, 1 नवंबर 2022

कतार



आज मेरे रिटायरमेंट को पूरे 3 साल हो गए... पता ही नहीं  चला कि.... ये वक्त कब निकल गया  ... सच ही तो है... वक्त कब और कहां ठहरा है किसी के लिए....बस मुट्ठी में बंद रेत की तरह चुपचाप फिसल जाता है...पीछे मुड़कर देखो तो ....कुछ भी हासिल नहीं होता... हथेली पर कुछ रेत के कण चिपके रहते हैं....वो भी धीरे धीरे आखिरकार गिर ही जाते हैं.....
        बस इसी उधेड़ बुन में लगा मै... बचपन में पिताजी की  हिदायतों भरे ....
और ...फिर भी दोस्तों संग मस्ती भरे और शरारतों के गलियारे से निकल ..... किशोरावस्था की सीढ़ी चढ़ने लगा ...  पढ़ने में मध्यम था फिर भी सामाजिक होने के कारण..... शिक्षको का प्रिय था ... मेरा स्वभाव हमेशा से ही संकोची और शर्मिला रहा... 
              यूं ही समय बीतता गया वक्त के साथ कदम ताल मिलाते हुए....जवानी के पायदान पर कदम रखा कालेज गया ... वहीं मित्र मंडली में मेरी एक मित्र बनी....कसमें वादे सब कुछ तो किए ....एक मुस्कान चेहरे पर ठहर गई....
                पर सच कहूं तो वादे करना बहुत आसान है ....निभाना उतना ही कठिन ...कितना ही आत्मवल चाहिए ...जिसकी शायद मुझमें कमी थी....
     पिताजी का डर ,पढ़ाई के बाद नौकरी की जद्दोजहद, मनचाही नौकरी ना मिलने के कारण..... कुंठा और भी बहुत सी बातें... उस वक्त लगा एक युवक होना कितनी जिम्मेदारियों भरा होता है....
       वक्त का सफर बदस्तूर जारी था ...वक्त बीता लम्बे इंतजार के बाद मनचाही नौकरी भी लगी पर .......कुछ बातें कहां इंतजार की मोहताज होती है...
            फिर समझो तो परिवार की जिम्मेदारियां ही सर्वोपरी होती हैं... मां पिता की उम्मीद भरी निगाहें .....
      कहां मुंह मोड़ा जाता है इन सब से... नालायक बनने के लिए भी बहुत हिम्मत चाहिए...
           इन सब के बीच मैने स्वयं ही सरेंडर  करके ....अपने मां पिताजी के सपनों को साकार करने की जिम्मेदारी उन्हीं पर सौंप दी...
      करीब एक साल बाद  मां की खुशी का ठिकाना नहीं था उनकी मन पसंद बहू जो आ रही थी...
         मां  खुश थी पिताजी खुश थे .....घर में चहल-पहल और  रौनक का वातावरण ....पर मैं ज्यों का त्यों दूर होते तमाशे को मूकदर्शक बना देखता .....आखिर वह घड़ी भी आ ही गई ....मेरे सर सेहरा बंधा और ले आया मै अपने साथ  घर को लक्ष्मी बनाने वाली गृह लक्ष्मी ...…
           ढोल ,मंगल - गीत , रीति रिवाज, रस्में ,हंसी - ठिठोली सब कुछ तो था..... पर मैं फिर भी अकेला का अकेला
        शाम ढली रात हुई रस्मों की रस्म निभाने या कहूं मां की पसंद का सामना करने जा पहुंचा कमरे में हल्की सी चूड़ी खनकी ,पायल की आवाज हुई लाल जोड़े में लिपटी वो मेरी आहट से और भी सिमट गई ..... घूंघट उठाया तो मां की पसंद मेरी पसंद से बिल्कुल अलग थी ..... 
        खैर जो होना था सो तो हो ही गया .....जब सौप दी अपने सपनो की बागडोर दूसरों के हाथ तो फिर नाराजगी या गुस्से का अधिकार कहां...फिर उसका भी दोष कहां....वो भी तो मेरे साथ ही बंधी है अग्नि के इर्द गिर्द सात फेरे लेकर....
         अब तो दूसरों की खुशी के लिए सब कुछ निभाना ही था....... मैं जिम्मेदारी निभाता रहा मूकदर्शक बन.... वह हुकुम की बादशाह  बनी घर संभालती रही.... और पारिवारिक जिम्मेदारियों को संभालती .... 
         जिंदगी के इसी उतार-चढ़ाव में दो नन्ही फूल सी बेटियों की किलकारी से  मेरा घर आंगन चहकने लगा 
     अब वक्त के साथ लगभग मेरे सपनों में  धुंध सी जमने लगी थी कभी-कभी धुंध  हटती भी तो परिवार और समाज की जिम्मेदारियों की चादर सब ढाप देती ......सच कहूं तो फुर्सत ही कहां मिलती है ......पीछे मुड़कर देखने की..... बेटियां चंदा सी बढ़ने लगी .....उचित घर वर देखकर उनकी पसंद से उनको भरे मन से विदा किया ......
        कब मैं समय के पायदान पर चढ़ते चढ़ते जिम्मेदारियों की गठरी लादे इतना आगे बढ़ गया कि कभी पीछे मुड़कर देखा ही नहीं .....
            आज इतने बरसों बाद .... मै  अनमना सा पीछे मुड़कर जो देखता हूं ....मेरे चेहरे पर अनगिनत रंग आते जाते रहे... 
     आज मै बालकनी में खड़े देखता हूं ....स्कूटर ,मोटरसाइकिल पर आते जाते हुए लोगों को .....तो सोचता हूं....इतनी भगदौड़ , इतनी आपाधापी....आखिर किसलिए....जब कभी मुड़कर पीछे देखना ही नहीं.... और मै ख्यालों में खोया  सबको खड़ा कर देता हूं .....एक समय के बाद एक कतार में..... जहां आज मै स्वयं खड़ा हूं....

Dr नीलम गुप्ता "नीरा"


सोमवार, 31 अक्टूबर 2022

हार की जीत




 
       काली अंधेरी रात .....खुला आसमान और तारे टिमटिमा रहे हैं बेफिक्र से... हर तरफ सन्नाटा.... हो भी क्यों ना ........लोग दिन भर की थकान से थक कर सो जो गए ..... भला रात के 2:00 बजे वैसे भी कौन जागता है.....।
    पर मेरी नींद मुझ से कोसों दूर ......सच कहूं तो ......अब तो रात भर जागने की एक आदत सी हो गई थी...... एक नियम सा बन गया था ......पर आज कुछ बेचैनी सी महसूस हो रही थी .......
इसी कारण मैं उठकर बाहर बालकनी में आकर खड़ी हो गई....... दूर तलक फैला सन्नाटा और अंधेरा .......और ......उस स्याह अंधेरे में कुछ खोजती सी.....मेरी आंखें 
        पहुंच गई आज से 20 वर्ष पहले जब ना अंधेरा था और ना ही सन्नाटा.... हर तरफ चहकता सा मधुर संगीत था....
          तब मैं 20 वर्ष की थी... जब लाल सुर्ख रंग का लहंगा पहने , भरे हाथ चूड़ियों के ....मांग में चटक सिंदूर लगाएं.... दुल्हन बन अपने बांके सजीले सपनों के राजकुमार के साथ इस घर में आई थी..... तब गूंज रहा था पूरा घर मेरी पायल की  झंकार से .....उस वक्त मुझे खुद से ही रश्क हो रहा था .....इतना स्मार्ट गोरा और सधी हुई कद - काठी का हमसफर पाकर ....।   तब मैं ही तो थी दुनिया की सबसे भाग्यशाली  युवती ......
      सभी कुछ सामान्य से बेहतर चल रहा था ....और चाहिए भी क्या एक युवती को प्यार करने वाला  .....उसकी हर ख्वाहिश को हाथों हाथ लेने वाला पति.... दिन तो मानो पंख लगा कर उड़ रहे थे ...
       पर हम तो इंसान हैं ना..... कब तक उड़ते पंख लगा कर.... यथार्थ को तो जीना ही पड़ता है... हर वक्त एक सा नहीं रहता....परिवर्तन तो प्रकृति का शाश्वत नियम है.... कभी तो नया भी पुराना होता है.... कलई तो उतरती ही है ना.....
          सच ही तो है वक्त कहां रुकता है .....और अच्छा वक्त तो मानो पंख लगाकर उड़ जाता है.... शादी को यही कोई सात - आठ  महीने ही बीते होंगे ......एक दिन घर पर कुछ मेहमान आए हुए थे...…बातों ही बातों में उन्होंने मेरी सुघड़ता और सुंदरता के पुल बांधने शुरू कर कर दिए .....मेरे साथी के चेहरे पर अनेकों रंग आते जाते रहे..... बात आई गई हो गई उस वक्त तो.....
       पर रात को जैसे ही सारी कलई खुल गई...... लगा जैसे किसी परी के पंख काट कर उसे जमीन पर बेरहमी से पटक दिया हो .....तभी यथार्थ से सामना हुआ दरवाजा खोला तो देखा..... नशे में धुत मेरे सपनों का राजकुमार खड़ा था वमुश्किल उसे अंदर कर दरवाजा बंद किया तो .....उन्होंने गाली और न जाने क्या-क्या बोलना शुरु कर दिया ......ये सब मेरे लिए इतना अप्रत्याशित था जैसे किसी ने मेरे कानों में तो जैसे गरम शीशा उड़ेल दिया हो..... कुछ भी समझ में नहीं आया..... मैने तो कभी कल्पना भी नहीं की थी..... मैं कुछ समझ पाती या कुछ बोल पाती.... उससे पहले ही एक मजबूत हाथ मेरे गाल पर पड़ा.... मैंने अपने आप को गिरते गिरते बचाया.... मैं कुछ माजरा  समझ पाती उससे पहले ही वह बिस्तर पर गिर कर सो गए .....और मैं भी पता नहीं गीली आंखों से नींद में समा गई...।
     सुबह उठी तो सब कुछ सामान्य था अपने पास बुला कर बोले..... यार कल कुछ दोस्तों के साथ ज्यादा हो गई थी और पता नहीं तुम्हें क्या - क्या बोल दिया....सच में सॉरी यार सॉरी....
     आखिर मैं तो स्त्री ही हूं भूल गई रात की बात को .....कर लिया उनकी बात पर विश्वास ....।   पर यह क्या अब तो आए दिन यह क्रम सा बन गया .....रात को नशे में धुत और सुबह माफी का नाटक ....।             शादी को भी  साल भर से ज्यादा हो गया था..... कहो तो किससे कहूं ..... मायके में बुजुर्ग मां पिताजी और भाई की अपनी  गृहस्थी ... गरम खून 
मैं चुपचाप सब सहती रही .....पर समझ ही नहीं पाती कि .....जो आदमी दिन में इतना लाड़ प्यार जताता है ....रात में हैवानियत कहां से आती है....।
     बस  इसी चक्र के चलते मैं दो बेटों की मां बन गई .....शायद इसी उम्मीद से कि कभी तो यह सुधरेंगे ही..... हो सकता है बेटों का मुंह देख कर ही यह सुधर जाए.....पर हालात और भी बदतर होते गए..... मैं स्वयं से और यथार्थ से  लड़ती रही लगता था..... जितना उजला मेरा रंग था उतनी ही काली मेरी किस्मत....।
         धीरे-धीरे वक्त के साथ मैं भी मशीन सी बन गई ...। एक लगाव था.... वह भी तार-तार हो गया .....मैंने अपना समय अपने बच्चों को देना शुरू कर दिया ....।
   पर कुदरत को तो कुछ और ही मंजूर था.... एक दिन पता चला मेरे पति की दोनों किडनी की हालत नशे के कारण बहुत खराब है .....पर आखिर पत्नी ही हूं ना ....मन से ना सही बेमन से ही उनके जीवन की दुआ मांगने लगी और उनकी जी जान से सेवा करती ......बदले में दुत्कार और गालियों के सिवा कभी कुछ नहीं मिला ....।
          पर कुदरत का लिखा कौन टाल सकता है...। एक दिन वह दोनों बच्चों को और मुझे छोड़कर चले गए....!
      मैं टूट कर पहले ही बिखर गई थी...... पर जो भी थोड़ा बहुत मेरे अंदर था..... वह भी तार-तार हो गया...... पर ऐसे कब तक चलता मुझे बच्चों के मासूम चेहरे देखकर संभलना ही था..... कब तक यूं मातम बनाए  रखती....।
      मुझे वक्त लगा कुछ महीनों का .......संभालने में खुद को..... मजबूत किया खुद को......दिन भर स्वयं को कोसते हुए मरने की बातें सोचने वाली .....मैं .......फिर से नए आत्मवल से खड़ी होने के लिए स्वयं को संभालती रही .......आखिर जीत मेरी हुई....।    
           मैंने धीरे धीरे कारोबार संभाला और बच्चों को मां पिता दोनों की तरह परवरिश की....।            आज उसी का नतीजा है कि मेरे दोनों बेटे मुकाम हासिल कर करके अपने पैरों पर खड़े हैं....।
          दुनिया , समाज और स्वयं से लड़ते हुए आखिरकार ....मैं... हार कर भी जीत गई ......इस स्याह रात में जब सारी दुनिया सो रही है..... मुझसे नींद कोसों दूर है .....मैं बालकनी में खड़ी .....आसमान में बेफिक्र से तारे को  टिमटिमाते हुए  देखकर सोचती हूं ......जहां  जंग में खुद से हार कर....!!

Dr नीलम गुप्ता " नीरा"

शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

राही

राही 

राही 
राह पर चलते एक राही से पूछा मैने..
क्यों चलते हो इस कंकरीले रास्ते पर
निरे कांटों से अटा पड़ा है ये रास्ता
हर तरफ़ विरानगी छाई हुई है...
दूर तलक कोई मंजिल भी दिखाई देती नहीं...
वो मुसाफिर कुछ ठिठका...मुस्कुराया 
एक उड़ती सी नजर मुझ पर डाली
और सहज हो बोला...
माना कि ...तुम सही हो
पर ये तो बतलाओ...जरा सी ठोकर से
मंजिल की इन बाधाओं से...
 घबराकर
क्यों बदलूं पथ अपना...
मै ना चलूंगा तो कोई तो चलेगा
कोई तो करेगा ...एक नई पहल 
जो मिटा कर राह की वधाओ को
करेगा पथ प्रस्स्त ..
फिर मै क्यों  नहीं....??
चुभेंगे नहीं कंकर पत्थर तो ..
आगे बड़ने  की   ललक कैसे जागे..
मिल गई जो मंजिल सहज 
फिर वो मंजिल क्या....?
वो राह ही क्या ...जो नीरस हो
कुछ कह पाती मै....
उससे पहले वो ... राही 
 यूं बोल  फिर चल दिया ...
अपनी मंजिल की ओर....
और.... मै
देखती रही ...उसे अपनी घुन में जाते हुए
एकटक.....

# Dr Neelam Gupta "नीरा"


मंगलवार, 20 सितंबर 2022

एक कप चाय

आज सुबह सुबह 
चाय का प्याला लेकर बालकनी में आई
 भोर वेला ....... सुहाना मौसम ...
एक आध पंछी चहक रहे थे ...
अब बची ही कहां है जगह उनके 
 नीड़ बनाने के लिए .... 
पेड़ तो बस नाम के ही रह गए हैं....
हर तरफ तो बहुमंजिल इमारतें....
आज गर्मी से कुछ राहत थी ....
कुछ कल  की बारिश की हल्की फुहार का असर था ....
और कुछ आज भी घटा सी थी...
कुल मिलाकर मौसम खुशगवार था....
 और मै....मौसम का आनंद लेते हुए...
बालकनी में खड़ी देख रही थी ....आने जाने वालों को...
 वो शायद वक्त को मात देकर आगे जाना चाहते थे....
    पर मै... 
  हाथ में चाय का प्याला थामे वहीं की वहीं...
 मेरा मन  ऐसे में कहां रुकता...
उसे तो बस  हल्की सी आहट चाहिए....
  और ...
आंखें चुप चाप वहीं से लम्बा सफर तय कर लेती हैं....
             ....................

     चारों तरफ  हरी घास कुछ बड़े पेड़... रंगीन फूल
लगता था सबके जीवन में रंग भर देंगे....
     वहीं पर  तुम संग जीए वो पल
 बेतुकी सी बातें ... बिना बात हंसना... दीन दुनिया से बेखबर

सारी रस्मों तो ताक पर रख...अपनी एक अलग दुनिया....
      कभी नोक - झोंक तो कभी मान मनुहार...तेरा मेरा नहीं बस हमारा संसार....
       सब कुछ पॉपकॉर्न और सौंधी आंच पर भुने भुट्टे में ही पूरा हो जाता था....
  बस एक छोटी सी दुनिया थी हमारी अपनी...
जहां भविष्य  से कोई वास्ता नहीं...बस जो है वो आज ही है....
       पर वक्त के पंख होते हैं तब सुना था.... फिर देखा भी...
      सपनों की दीवार शायद वक्त से कुछ कच्ची थी...
 हल्की सी ठसक लगी और ढह गई... 
 फैली हुई बाहों को यूं इंतजार का ढाढस दे चले गए... 
    आंखों के सपने नमी में धुंधले हो गए....
  तब जाना कसमें वादे तो बने ही होते हैं ...टूटने के लिए
 आंखों का सारा काजल बह गया...
तब तो अपने ही हाथ पराए से हो गए....काजल की रेखा को साफ करने की हिम्मत ना जुटा पाए....
   पर वक्त कब किसका हुआ है....
सच वक्त के पंख होते हैं....

     ........................
 
       तभी अंदर से आवाज आई...
अरे भई आज कहां हो.....
  मै बालकनी में खड़े खड़े ही लौट आई... गालों पर लुढ़क आई बूंदों को फटाफट साफ किया 
कहीं इतने बरसों बाद चोरी ना पकड़ी जाए...
  सच यादें तो राख में दबी चिंगारी सी होती हैं...
जो कभी बुझती नहीं ...सुलगती रहती है धीरे धीरे...
  अच्छा अब ठंडी हुई चाय का प्याला मेज पर रख....
लगती हूं सुबह के कामों में....
मिलती हूं फिर....एक प्याला गरम चाय के साथ...

#  नीलम गुप्ता  "नीरा"

इक पाती तेरे नाम

आज वर्षों बाद ...
मै फिर से लिखने बैठी "इक पाती तेरे नाम"
 वो तेरी यादें...
 वो तेरी बातें 
 वो सुनहरी धूप 
 वो शीतल छांव 
 वो मंद बयार 
वो उन्मुक्त हंसी
वो  नीला आसमान
कुछ भी तो नहीं बदला....
..............

सब कुछ आज फिर से  जीवंत सा हो उठा....
एक अंतराल बाद जब तुम मिले 
तब समझ आया कि ...
वो ख्वाब जो बचपन में सखी सहेलियों संग साझा किए थे....
कि....
 आएगा सफेद घोड़े में एक राजकुमार
 मेरे सपनों को जो देगा नई उड़ान 
 कराएगा मुझे वो सैर परियों के देश की
वो तुम हो...
...............

सच में.... 
 वो राजकुमार तो किस्से कहानियों का था...
पर हकीकत में ....
स्नेह, सम्मान ,परवाह और  अनकहे मनोभावों को जो पढ़े
 वही तो राजकुमार है....सफेद घोड़े वाला 
.............

सुनो ...
मन करता है अब ....
फिर से लौट जाऊं ... उन हंसी पलों में....
फिर से अठखेलियां करूं....
 झूमूं खुले आसमान तले....

.............

तुम संग फिर से....
ख्याबों में फिर से रंग भरने लगी मैं....
जीने लगी उन लम्हों को  एक बार फिर से....
बस....
लापरवाह सी मैं....
सपनों के पन्नों में ख्यावों की स्याही से ....
लिखने बैठी ....आज फिर से..
"इक पाती तेरे नाम "

Dr नीलम गुप्ता। " नीरा "


चाय

उम्र के हर मोड़ पर एक चाय ही तो है
जो रंग भर देती है जिन्दगी में....
चाय फीकी हो या मीठी क्या फर्क पड़ता है
पर इसकी हर एक चुस्की जिन्दगी में मिठास भर देती है...
ये वो सांवली सलोनी चाय ही तो है..
जो यादों से चेहरे गुलाबी कर देती है...
सुबह की हो या शाम की चाय....
दोस्ती का हर जज्बा हर वक्त सलामत जो रखती है
वो चाय ही तो है....


ललना

एक नारी, स्त्री, ललना.... ना जाने कितने ही नामों से जाने जानी वाली एक औरत का जब नाम आता है ...... तब एक खाका उभर कर सामने आता है.... दुबली पतली मांग को चटख सिन्दूर से सजाए , माथे पर लाल बिंदी लगाए , होठों पर मधुर मुस्कान लिए , कजरारी आंखों वाली  , कानों को बालियों से सजाए ,  बालों को करीने से बांधे  और एक लापरवाह सी लट गालों को चूमती , गले में  मंगल सूत्र डाल कर इतराती .... ... ओर.....पैरो पर पायल - बिछुए  और महावर से स्वयं को  संवारती ...  करीने से बंधी साड़ी में खुद को समेटे हुए.... यही तो है वो   
 स्त्री.... 
               यही स्त्री जो सबकी आकर्षण का केंद्र है.... रूक जाती हैं  चलते चलते निगाहें उसके  उभारों पर... यही नहीं निगाह रखी जाती है उसके एक एक पल पर.... उसका उठना बैठना सभी तो दायरे तय कर दिए जाते हैं....जैसे कोई ठेकेदार हो उसका...
      पर क्या सोचा है कभी... उसमें भी जान है एक दिल है जो धड़कता है...कुछ भावनाएं हैं, अहसास है ,उसका भी वजूद है....  शायद नहीं ना...अगर सोचा होता तो वो यूं मजबूर ना होती निगाहें झुका कर चलने को....
      सच तो ये है ...कोई ये भी नहीं सोचता कि ये वही नारी है..... जो ना जाने अपने अंदर कितनी वेदना , दर्द और मान - अपमान , तिरस्कार का अथाह समुंदर समेटे हुए है अपने अंदर.... कितनी की अपनी इच्छाओं का गला घोटाती है ....परिवार की इच्छाओं को पूरा करने के लिए.... हर रोज सौ दफा मरती है...एक परिवार को बचाने के लिए... हजार बार वो चुप होती है दूसरों को बोलने का मौका देने के लिए ... कभी स्वयं चुप होती है तो ....कभी जबरन चुप कराई जाती है...वो चीत्कार नहीं करती बस पी लेती है विष का घूंट मीरा की तरह.... वो  सींचती है रिश्तों को अपने आंख के पानी से... तभी तो वो बनती है त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति....
            ये स्त्री ही है..... जहां जाती है वहां महका देती है घर आंगन .... ईट मिट्टी गारे जैसी  बेजान चीजों में जान डाल देती है..... ईट मिट्टी गारे से बने मकान को अपने शुभ कदम रखते ही घर और अपनी तपस्या से घर को मन्दिर बना देती है .... जिसके चहकने से  किलकारी गूंजती हैं घर में....
      सच में स्त्री तुम इस धरा का मान हो 💕

# नीलम "नीरा"