शनिवार, 1 अगस्त 2020

तुम -सुभद्रा कुमारी चौहान

जब तक मैं मैं हूँ, तुम तुम हो,
है जीवन में जीवन।
 कोई नहीं छीन सकता
 तुमको मुझसे मेरे धन॥

 आओ मेरे हृदय-कुंज में
 निर्भय करो विहार।
 सदा बंद रखूँगी
 मैं अपने अंतर का द्वार॥

 नहीं लांछना की लपटें
 प्रिय तुम तक जाने पाएँगीं।
 पीड़ित करने तुम्हें
 वेदनाएं न वहाँ आएँगीं॥

 अपने उच्छ्वासों से मिश्रित
 कर आँसू की बूँद।
 शीतल कर दूँगी तुम प्रियतम
 सोना आँखें मूँद॥

 जगने पर पीना छक-छककर
 मेरी मदिरा की प्याली।
 एक बूँद भी शेष
 न रहने देना करना ख़ाली॥

 नशा उतर जाए फिर भी
 बाकी रह जाए खुमारी।
 रह जाए लाली आँखों में
 स्मृतियाँ प्यारी-प्यारी॥

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