बुधवार, 12 अगस्त 2020

नज़र ankur

उसके चले जाने के बाद 
जिंदगी की हर बात सुलझ गई 
उसने सामने आकर नक़ाब  क्या हटाया
 जिंदगी फिर से उलझ गई ।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
        अंकुर गुप्ता

सोमवार, 3 अगस्त 2020

निन्दा

" निन्दा "...एक ऐसा शब्द ..जिसे सुनकर ... मन को विचलित करने वाला भाव मन में  आता है...
परन्तु अगर हम स्वयं किसी की निन्दा करें तो आनन्द भी बहुत आता है...ये दोनों ही बातें  अलग हैं ....परन्तु ये एक स्वभाविक प्रक्रिया है....
परन्तु अगर हम दूसरे दृष्टिकोण से सोचें तो... निन्दा  के भाव ही बदल जायेंगे ...हमारी विचारधारा का रूख ही बदल जायेगा ....
बस सोचने की बात सिर्फ इतनी है...कि कोई भी हमारी निन्दा क्यों  करता है....कुछ तो विशेष है ना....हम में ....उससे
तभी तो वो अपने अमूल्य समय में हमारे बारे में सोच रहा है...कहीं ना कहीं हम उसके दिल दिमाग में  समाये हुए हैं ..दूसरी बात...किसी ना किसी मामले में अवश्य ही  हम उससे क्षेष्ठ हैं ....तभी तो उस पर हमारा कब्जा है...
फिर नाराजगी कैसी ....हम भी खुश रहें ...वो भी खुश रहे....बस जरा सी सोच बदली ...मायने बदल गये....
( एक बार सोच कर तो देखिए )

# नीलम " नीरा "

शनिवार, 1 अगस्त 2020

उपेक्षा -सुभद्रा कुमारी चौहान

इस तरह उपेक्षा मेरी,
क्यों करते हो मतवाले!
आशा के कितने अंकुर,
मैंने हैं उर में पाले॥

 विश्वास-वारि से उनको,
मैंने है सींच बढ़ाए।
 निर्मल निकुंज में मन के,
रहती हूँ सदा छिपाए॥

 मेरी साँसों की लू से,
कुछ आँच न उनमें आए।
 मेरे अंतर की ज्वाला,
उनको न कभी झुलसाए॥

 कितने प्रयत्न से उनको,
मैं हृदय-नीड़ में अपने,
बढ़ते लख खुश होती थी,
देखा करती थी सपने॥

 इस भांति उपेक्षा मेरी,
करके मेरी अवहेला,
तुमने आशा की कलियाँ
 मसलीं खिलने की बेला॥

कलह-कारण -सुभद्रा कुमारी चौहान

कड़ी आराधना करके बुलाया था उन्हें मैंने।
 पदों को पूजने के ही लिए थी साधना मेरी॥
 तपस्या नेम व्रत करके रिझाया था उन्हें मैंने।
 पधारे देव, पूरी हो गई आराधना मेरी॥

 उन्हें सहसा निहारा सामने, संकोच हो आया।
 मुँदीं आँखें सहज ही लाज से नीचे झुकी थी मैं॥
 कहूँ क्या प्राणधन से यह हृदय में सोच हो आया।
 वही कुछ बोल दें पहले, प्रतीक्षा में रुकी थी मैं॥

 अचानक ध्यान पूजा का हुआ, झट आँख जो खोली।
 नहीं देखा उन्हें, बस सामने सूनी कुटी दीखी॥
 हृदयधन चल दिए, मैं लाज से उनसे नहीं बोली।
 गया सर्वस्व, अपने आपको दूनी लुटी दीखी॥

इसका रोना -सुभद्रा कुमारी चौहान

तुम कहते हो - मुझको इसका रोना नहीं सुहाता है।
 मैं कहती हूँ - इस रोने से अनुपम सुख छा जाता है॥
 सच कहती हूँ, इस रोने की छवि को जरा निहारोगे।
 बड़ी-बड़ी आँसू की बूँदों पर मुक्तावली वारोगे॥1॥

ये नन्हे से होंठ और यह लम्बी-सी सिसकी देखो।
 यह छोटा सा गला और यह गहरी-सी हिचकी देखो॥
 कैसी करुणा-जनक दृष्टि है, हृदय उमड़ कर आया है।
 छिपे हुए आत्मीय भाव को यह उभार कर लाया है॥2॥

हँसी बाहरी, चहल-पहल को ही बहुधा दरसाती है।
 पर रोने में अंतर तम तक की हलचल मच जाती है॥
 जिससे सोई हुई आत्मा जागती है, अकुलाती है।
 छूटे हुए किसी साथी को अपने पास बुलाती है॥3॥

मैं सुनती हूँ कोई मेरा मुझको अहा ! बुलाता है।
 जिसकी करुणापूर्ण चीख से मेरा केवल नाता है॥
 मेरे ऊपर वह निर्भर है खाने, पीने, सोने में।
 जीवन की प्रत्येक क्रिया में, हँसने में ज्यों रोने में॥4॥

मैं हूँ उसकी प्रकृति संगिनी उसकी जन्म-प्रदाता हूँ।
 वह मेरी प्यारी बिटिया है, मैं ही उसकी प्यारी माता हूँ॥
 तुमको सुन कर चिढ़ आती है मुझ को होता है अभिमान।
 जैसे भक्तों की पुकार सुन गर्वित होते हैं भगवान॥5॥

चलते समय -सुभद्रा कुमारी चौहान

तुम मुझे पूछते हो ’जाऊँ’?
मैं क्या जवाब दूँ, तुम्हीं कहो!
’जा...’ कहते रुकती है जबान,
किस मुँह से तुमसे कहूँ ’रहो’!!

सेवा करना था, जहाँ मुझे
 कुछ भक्ति-भाव दरसाना था।
 उन कृपा-कटाक्षों का बदला,
बलि होकर जहाँ चुकाना था॥

 मैं सदा रूठती ही आई,
प्रिय! तुम्हें न मैंने पहचाना।
 वह मान बाण-सा चुभता है,
अब देख तुम्हारा यह जाना॥

चिंता -सुभद्रा कुमारी चौहान

लगे आने, हृदय धन से
 कहा मैंने कि मत आओ।
 कहीं हो प्रेम में पागल
 न पथ में ही मचल जाओ॥

 कठिन है मार्ग, मुझको
 मंजिलें वे पार करनीं हैं।
 उमंगों की तरंगें बढ़ पड़ें
 शायद फिसल जाओ॥

 तुम्हें कुछ चोट आ जाए
 कहीं लाचार लौटूँ मैं।
 हठीले प्यार से व्रत-भंग
 की घड़ियाँ निकट लाओ॥