मंगलवार, 8 नवंबर 2022

l LOVE U

पापा से हमेशा कम बोलने बाली ...उनकी हर बात को आदेश समझ कर मानने वाली ...कभी कदास ही पापा के पास बैठने वाली...पर आज जब पापा के पास बैठी तो मुझे फायदा हुआ.... बातों ही  बातों में उन्होने बताया ...प्यार कैसे जताया जाता है.... बोले मेरे प्यार जताने का तरीका जुदा  है तेरी मां से.... मै I Love You नही बोलता  तेरी मां से.... जब वो पूछती है सब्जी क्या बनाऊं...तो कहना आज तुम्हारी पसंद की....कोई डोरवेल बजाए तो... झट दरवाजे पर जाकर दरवाजा खोलना...कभी बाजार से आए तो एक गिलास पानी का देना....कभी कभी एक प्याली चाय अपने हाथो से बना कर पिला देना... जब वो गुमसुम सी हो उसको हंसा देना ... और हां कभी कभी चार बातें सुना उसको छेड़ना....सामने रखी चीज को अनदेखा कर उसको पुकारना....पापा बोले जा रहे थे हर एक बात और मै सुने जा रही थी....
         तब मैंने सोचा ... सच में प्यार ऐसा होता है...क्या हम भी ऐसा ही प्यार करते हैं  ...हम भी क्या इसी प्यार को जीते हैं ....अंदर से एक आवाज  आई.... नहीं 
  हम  तो  बस वेलेंटाइन डे को ही प्यार मानकर मना लेते है प्यार को केवल I Love U में ही जी लेते हैं.. ...अब सोच लिया मैने  जिस दिन मां पापा जितना प्यार करना सीख जाऊंगी..... अपने प्यार को परवाह से जता पाऊंगी ...उसी दिन से हर रोज असली वेलेंटाइन डे  मनाऊंगी.... 💕

शनिवार, 5 नवंबर 2022

कड़वा सच

जीवन की सच्चाई 

हम जिन्दगी भर स्वयं ही परेशान रहते हैं... सच में देखा जाए तो जिंदगी बहुत सीधी सरल और सहज हैं ...लेकिन हम बिना बात जिन्दगी को इतना जटिल और भयावह बना देते हैं कि वो हमें पहाड़ सी लगने लगती है.... 
मानती हूं कुछ सपने कुछ इच्छाएं कुछ लालसाएं होती हैं एक उम्र पर  और ये भी सच है कि एक उम्र के बाद सब खत्म भी हो जाती है...पर पता नही कब एक अलग  दुनिया बना लेते हैं  और सब कुछ जानकर अनजान बने रहते हैं....
हम जिन्दगी भर बड़ा छोटा अपना पराया में उलझे रहते हैं जबकि एक वक्त पर हम सभी एक से होते हैं....बस 
मत परेशान हो, क्योंकि आमतौर पर...

 1. चालीस साल की अवस्था में "उच्च शिक्षित" और "अल्प शिक्षित" एक जैसे ही होते हैं। (क्योंकि अब कहीं इंटरव्यू नहीं देना, डिग्री नहीं दिखानी).

2. पचास साल की अवस्था में "रूप" और "कुरूप" एक जैसे ही होते हैं। (आप कितने ही सुन्दर क्यों न हों झुर्रियां, आँखों के नीचे के डार्क सर्कल छुपाये नहीं छुपते).

3. साठ साल की अवस्था में "उच्च पद" और "निम्न पद" एक जैसे ही होते हैं। (चपरासी भी अधिकारी के सेवा निवृत्त होने के बाद उनकी तरफ़ देखने से कतराता है).

4. सत्तर साल की अवस्था में "बड़ा घर" और "छोटा घर" एक जैसे ही होते हैं। (बीमारियाँ और खालीपन आपको एक जगह बैठे रहने पर मजबूर कर देता है, और आप छोटी जगह में भी गुज़ारा कर सकते हैं).

5. अस्सी साल की अवस्था में आपके पास धन का "कम होना" या "ज्यादा होना" एक जैसे ही होते हैं। (अगर आप खर्च करना भी चाहें, तो आपको नहीं पता कि कहाँ खर्च करना है).

6. नब्बे साल की अवस्था में "सोना" और "जागना" एक जैसे ही होते हैं। (जागने के बावजूद भी आपको नहीं पता कि क्या करना है).

जीवन को सामान्य रुप में ही लें क्योंकि जीवन में रहस्य नहीं हैं जिन्हें आप सुलझाते फिरें.

आगे चल कर एक दिन सब की यही स्थिति होनी है, यही जीवन की सच्चाई है...

चैन से जीने के लिए चार रोटी और दो कपड़े काफ़ी हैं... पर ,बेचैनी से जीने के लिए चार गाड़ी, दो बंगले और तीन प्लॉट भी कम हैं !!

ये जीवन की  कड़वी सच्चाई है जिसने भी इसको स्वीकार कर लिया उसे परमानंद ही प्राप्ति हो जायेगी  इसलिए  चैन से रहिए खुश और मस्त रहिए....
और हां बच्चों को वक्त और संस्कार दीजिए .... यही हम सभी की जमा पूंजी है 💕

(इस पोस्ट को मैं मिश्रित पोस्ट का नाम दूंगी क्योंकि इसमें कुछ मेरा और कुछ किसी और का लिखा है फर्क क्या पड़ता है जीवन की कड़वी सच्चाई  लिखी है जिसे हम स्वीकारते ही नहीं  अंत सब का एक ही है....कितने भी ऐशो आराम में जी लो पर शमशान में सबका बिस्तर एक सा ही है )

नफा नुकसान

नफा नुकसान

रविवार का दिन था.... ऑफिस की छुट्टी थी.... फिर नवंबर में हल्की सर्दी भी होने लगी थी... मैं आराम से बिस्तर पर बैठ कर फुर्सत में अखबार पढ़ रहा था... साथ में पत्नी चाय देकर गई थी वह मैं पी रहा था..... वैसे तो फुर्सत ही कहां मिलती है.... सुबह उठो तैयार होओ... बच्चों को स्कूल छोड़ो और ऑफिस जाओ...... बच्चों का स्कूल ऑफिस के रास्ते में ही पड़ता था...... इसलिए उनको छोड़ता हुआ ऑफिस निकल जाता हूं.... यही क्रम पूरे हफ्ते चलता है..... संडे के अतिरिक्त किसी भी दिन फुर्सत नहीं मिलती इसलिए सारे  काम संडे को ही फुर्सत में होते हैं...।
      अभी चाय की चुस्की ली ही थी कि.....डोर बेल बजी मैं अलसाया सा नहीं उठा ....सोचा पत्नी ही दरवाजा खोल देगी.... शायद पत्नी किसी काम में व्यस्त थी ....या फिर उसने डोरबेल नहीं सुनी .....तभी दोबारा डोर बेल बजी तो मैं अपने आप से बोला...... कौन है भाई इतनी सुबह सुबह संडे के दिन तो फुर्सत से रहने दो....।
 मैंने  अनमने मन से उठकर..... जैसे ही दरवाजा खोला.....सामने  एक स्मार्ट सा युवक खड़ा था.... मैं अभी उसे ऊपर से नीचे तक निहार ही रहा था.... तभी उसने बड़ी शालीनता भरे अंदाज से कहा.... नमस्ते अंकल जी और मेरे पैर छुए......मैंने भी प्रत्युत्तर में नमस्ते बेटा कहा .....पर मैं असमंजस में था और पहचानने की कोशिश कर रहा था...... कि इतना अदबदार शालीन युवक कौन है ......मेरे दिमाग की घड़ी वक्त से भी तेज चल रही थी उस वक्त.....मैं पहचानने की कोशिश कर ही रहा था पर असफल ही रहा....
          शायद वह मेरी मन: स्थिति समझ गया था .....बोला.... अंकल जी आपने शायद मुझे पहचाना नहीं ....... मैं कुछ झेंप सा गया ......जैसे कि मेरी चोरी पकड़ी गई हो.....मैंने जल्दी से कहा पहले अंदर आओ ....तब बात करते हैं..... वह बिना कुछ बोले मेरे पीछे पीछे ड्राइंग रूम में आ गया ......मैंने बैठने का इशारा किया तो ..... वो बैठ गया..... इतने में पत्नी भी अंदर से कौन है ....??   कहते हुए आ गई ......साथ ही पानी का गिलास  भी लाई...।
      वह युवक सोफे पर बैठ गया और ड्राइंग रूम का उड़ती नजर से मुआयना करने लगा और मैं उसका......वो शायद सोच रहा हो कहां से बात शुरू करे....     मैं कुछ कहता  इससे पहले ही वो बोल पड़ा .....लगता है अंकल जी  आपने मुझे पहचाना नहीं..... मैंने कुछ झेंपते हुए कहा..... शायद उम्र हो हो चली है मेरी .....इसलिए याददाश्त साथ नहीं दे रही..... युवक सधी हुई आवाज में बोला .....मैं वही हूं..... जो अपने पापा के साथ आया था..... 5 साल पहले आपका स्कूटर लेने के लिए आया था तब हमारे पास पैसे कम थे ...लेकिन आपने अपना स्कूटर हमारी मजबूरी समझते हुए हमें ....... नुकसान में बेच दिया ......और साथ ही मिठाई और पेट्रोल के  ₹500 भी दिए..... वह युवक धाराप्रवाह बोले जा रहा था .....उस दिन बहुत दिनों बाद हमने खरीद कर मिठाई खाई थी....... मैंने तभी सोच लिया था कि कुछ बन जाने पर आप जैसे देवता आदमी से मिलने जरूर आऊंगा .....
          आपके स्कूटर ने मेरी  क्या पूरे परिवार की स्थिति ही बदल डाली ......आपको पता है..... अंकल जी वह स्कूटर आज भी मेरे घर पर है .....आपसे स्कूटर लेकर मेरा आने जाने का समय बच जाता था..... तब मैंने ट्यूशन पढ़ाने शुरू कर दीए.....जिससे पापा को कुछ मदद मिल जाए..... फिर मैंने बीटेक ऑनर्स में पास किया...... 1 साल छोटी मोटी नौकरी की साथ ही ट्यूशन भी पढ़ाता रहा .....घर की स्थिति सुधरने लगी थी..... फिर पुणे की एक कंपनी में अच्छी जॉब मिल गई ......आज जैसे ही मैं घर आया ......तो आपसे मिलने चला आया ...।   आपको कुछ देने लायक तो नहीं हूं पर आपके एहसान का बदला कभी भी नहीं चुका सकता...... मैं दिल से आपका शुक्रिया करता हूं...... सच में आपके स्कूटर ने हमारी जिंदगी बदल दी .....वह लगातार एक सुर में बोलता ही जा रहा था .....और.... मैं ....कभी पत्नी को कभी उस युवक को देख रहा था...... मेरे पास कुछ शब्द भी नहीं ही नहीं थे...... मैं सिर्फ इतना ही बोल पाया ......बेटा नफा नुकसान तो चलता ही रहता है .....उस वक्त मुझे लगा तुमको स्कूटर की ज्यादा जरूरत है...... तभी मेरी पत्नी चाय ले आई बोली...... बेटा नाश्ता करोगे ......उसने केवल चाय पी और फिर से धन्यवाद कहते हुए  मेरे और पत्नी के पैर छू कर चला गया.....।
 मैं वहीं सोफे पर धंसा रहा .....मेरे सामने आज से 5 साल पहले का  पूरा घटनाक्रम घूम गया ..... स्कूटर पुराना हो गया था..... घर में बेकार पड़ा था सो  OLX  में   30,000  पर डाल दिया ......बहुत से कॉल आए 27000 , 25000 , 24000 , 28000 के .....बस एक कॉल आया 29000 का ..... मैंने मन बना लिया कि 29000 में बेच ही दूंगा.....।
     अगले दिन सुबह एक कॉल आई....साहब आपने OLX  पर स्कूटर के लिए डाला है..... मैंने संचित सा जवाब दिया .....हां
   उधर से एक दबी सी आवाज आई साहब मैं जोड़ तोड़ कर  ₹24000  ही कर पाऊंगा  ....जो कम पड़ेंगे तो मैं कहीं से इंतजाम कर लूंगा ......अगर संभव हो तो वह स्कूटर मुझे ही देना.....  मेरे बेटे को बहुत जरूरत है .....उसका समय बच जाएगा साहब..... वह पढ़ाई में बहुत अच्छा है....।
            मुझे  लगा जैसे सच में उसको जरूरत हो .....उसकी आवाज में कुछ ऐसी मजबूरी की कसक थी कि..... लगा जैसे सच में उसको जरूरत है ....मैंने कहा...... ठीक है तुम कल आ जाओ....।
      फिर शाम को दो तीन बार उसका फिर कॉल आया साहब.... कल जरूर आऊंगा.... पैसों का इंतजाम कल तक हो ही जाएगा..... कल दूसरा शनिवार था मेरी छुट्टी भी थी ...।
         वह शायद रात को सो भी नहीं पाया होगा..... सुबह 10:00 बजे ही आ गया .....अपने बेटे के साथ ....हाथ जोड़कर खड़ा था....उसने  कहा ....साहब बड़ी मुश्किल से इंतजाम हो पाया ... और नोट मेरे हाथ में थमा दिए
फिर मुझसे बोला .....साहब गिन लीजिए ...... उनमें मुड़े पुराने ...500 के , 100  और 50  के बहुत से नोट थे...... मैं समझ गया उसने कैसे इंतजाम किया होगा ....मैंने कहा.... तुमने गिन लिए तो पूरे ही होंगे.... उसका बेटा हाथ से स्कूटर साफ कर रहा था.... उसकी आंखों में चमक थी ..... उस वक्त मुझे लगा कुछ नुकसान तो हुआ पर किसी का भला हो गया...... वास्तव में ये जरूर मंद है .....हाथ जोड़कर बार-बार धन्यवाद देते हुए .....वह जैसे ही जाने के लिए मुड़ा..... मैंने उसको आवाज दी.... और ....पांच सौ का नोट देते  हुए मैं बोला...... घर जा रहे हो तो.... बच्चों के लिए मिठाई लेते जाना और हां जरूरत पड़े तो पेट्रोल भी डलवा लेना .....मिठाई और पेट्रोल दोनों इसमें आ जाएंगे....।
             उसके जाने के बाद मैंने सोचा..... मुझे नुकसान तो ज्यादा नहीं हुआ .....पर अगर किसी का भला हो जाए तो क्या बुराई है..... मेरा स्कूटर किसी के काम आए इससे ज्यादा और क्या चाहिए .....नफा नुकसान तो चलता ही रहता है....।
          मेरी तंद्रा तब टूटी जब..... पत्नी ने आकर कहा.... देखिए 12:00 बज रहे हैं फटाफट नहा कर आइए.... मैं नाश्ता लगाती हूं .....और मैं.... पत्नी के आदेशानुसार प्रसन्न मन से नहाने चला गया....।

 # Dr नीलम गुप्ता  "नीरा"

बुधवार, 2 नवंबर 2022

मेरे सखा

आज बरसों बाद भी
तुमको पढ़ रही हूं....
सोचती हूं कभी इस तरह मिले थे हम
 शायद हर रोज ही...
 जब भी मैने पुकारा तुम हमेशा 
मेरे साथ थे....
ना वादे ना कसमें ...
पर हर रोज मेरी शिकवे शिकायतें...
तुम सुनते फिर हौले से मुस्कुराते 
जैसे मेरी सारी उलझनों को सुलझाने का 
दारोमदार तुम पर हो...
और मैं बेफिक्र सी...
 कभी मां बन जाते तो कभी पिता 
तो कभी बड़ा या छोटा भाई
तो कभी सखा तो कभी सहेली...
 और .... मैं हर मसले का हल 
तुम मै ढूढती...जैसे तुम 
कोई अलाउद्दीन का चिराग हो...
सच कहूं तो ...
तुम मेरे लिए चिराग ही तो थे...
ना कोई इजहार था ना इकरार 
ना तुम्हारी कोई चाहत थी
ना मेरी...बस एक अलबेला रिश्ता 
पर कोई तो नेह डोर से बंधे थे हम...
 तभी तो तुम ....
आज भी मेरे उतने ही करीब हो
जितने तब....
मिलने ना मिलने का सवाल ही कहां था
तुम मुझे पढ़ते गए और मैं तुमको लिखती गई...
पर आज.... बरसों बाद
हर रोज पढ़ लेती हूं तुम्हें...
और बांच लेती हूं ख्यालों में...
  तुम आज भी मेरे अलाउद्दीन के चिराग हो 
 पता नहीं क्या रिश्ता है मेरा 
तुमसे.....
प्यार इश्क मोहब्ब्त चाहत का ...
अरे नहीं...
हमारा तो रूहानी रिश्ता है...
जिसका कोई नाम नहीं ...
बेनाम सा... सबसे कोसों दूर
मेरे सखा


 # नीलम "नीरा"

प्रेम

किसी ने कहा मुझसे.....
तुम बड़ा प्रेम लिखती हो...
:
:
मैं हौले से मुस्कुराई...
फिर आहिस्ता से बोली... 
चलो तुम्हारी बात मानती हूं....
:
;
आज से क्या...
 अभी से प्रेम लिखना छोड़ती हूं....
नफरत लिखना शुरू करती हूं...
:
 इसका शुभारंभ मै...
अभी से तुमसे करती हूं...
बोलो मंजूर है...
फिर दोनो खिलखिलाए....

# नीलम "नीरा"

मंगलवार, 1 नवंबर 2022

कतार



आज मेरे रिटायरमेंट को पूरे 3 साल हो गए... पता ही नहीं  चला कि.... ये वक्त कब निकल गया  ... सच ही तो है... वक्त कब और कहां ठहरा है किसी के लिए....बस मुट्ठी में बंद रेत की तरह चुपचाप फिसल जाता है...पीछे मुड़कर देखो तो ....कुछ भी हासिल नहीं होता... हथेली पर कुछ रेत के कण चिपके रहते हैं....वो भी धीरे धीरे आखिरकार गिर ही जाते हैं.....
        बस इसी उधेड़ बुन में लगा मै... बचपन में पिताजी की  हिदायतों भरे ....
और ...फिर भी दोस्तों संग मस्ती भरे और शरारतों के गलियारे से निकल ..... किशोरावस्था की सीढ़ी चढ़ने लगा ...  पढ़ने में मध्यम था फिर भी सामाजिक होने के कारण..... शिक्षको का प्रिय था ... मेरा स्वभाव हमेशा से ही संकोची और शर्मिला रहा... 
              यूं ही समय बीतता गया वक्त के साथ कदम ताल मिलाते हुए....जवानी के पायदान पर कदम रखा कालेज गया ... वहीं मित्र मंडली में मेरी एक मित्र बनी....कसमें वादे सब कुछ तो किए ....एक मुस्कान चेहरे पर ठहर गई....
                पर सच कहूं तो वादे करना बहुत आसान है ....निभाना उतना ही कठिन ...कितना ही आत्मवल चाहिए ...जिसकी शायद मुझमें कमी थी....
     पिताजी का डर ,पढ़ाई के बाद नौकरी की जद्दोजहद, मनचाही नौकरी ना मिलने के कारण..... कुंठा और भी बहुत सी बातें... उस वक्त लगा एक युवक होना कितनी जिम्मेदारियों भरा होता है....
       वक्त का सफर बदस्तूर जारी था ...वक्त बीता लम्बे इंतजार के बाद मनचाही नौकरी भी लगी पर .......कुछ बातें कहां इंतजार की मोहताज होती है...
            फिर समझो तो परिवार की जिम्मेदारियां ही सर्वोपरी होती हैं... मां पिता की उम्मीद भरी निगाहें .....
      कहां मुंह मोड़ा जाता है इन सब से... नालायक बनने के लिए भी बहुत हिम्मत चाहिए...
           इन सब के बीच मैने स्वयं ही सरेंडर  करके ....अपने मां पिताजी के सपनों को साकार करने की जिम्मेदारी उन्हीं पर सौंप दी...
      करीब एक साल बाद  मां की खुशी का ठिकाना नहीं था उनकी मन पसंद बहू जो आ रही थी...
         मां  खुश थी पिताजी खुश थे .....घर में चहल-पहल और  रौनक का वातावरण ....पर मैं ज्यों का त्यों दूर होते तमाशे को मूकदर्शक बना देखता .....आखिर वह घड़ी भी आ ही गई ....मेरे सर सेहरा बंधा और ले आया मै अपने साथ  घर को लक्ष्मी बनाने वाली गृह लक्ष्मी ...…
           ढोल ,मंगल - गीत , रीति रिवाज, रस्में ,हंसी - ठिठोली सब कुछ तो था..... पर मैं फिर भी अकेला का अकेला
        शाम ढली रात हुई रस्मों की रस्म निभाने या कहूं मां की पसंद का सामना करने जा पहुंचा कमरे में हल्की सी चूड़ी खनकी ,पायल की आवाज हुई लाल जोड़े में लिपटी वो मेरी आहट से और भी सिमट गई ..... घूंघट उठाया तो मां की पसंद मेरी पसंद से बिल्कुल अलग थी ..... 
        खैर जो होना था सो तो हो ही गया .....जब सौप दी अपने सपनो की बागडोर दूसरों के हाथ तो फिर नाराजगी या गुस्से का अधिकार कहां...फिर उसका भी दोष कहां....वो भी तो मेरे साथ ही बंधी है अग्नि के इर्द गिर्द सात फेरे लेकर....
         अब तो दूसरों की खुशी के लिए सब कुछ निभाना ही था....... मैं जिम्मेदारी निभाता रहा मूकदर्शक बन.... वह हुकुम की बादशाह  बनी घर संभालती रही.... और पारिवारिक जिम्मेदारियों को संभालती .... 
         जिंदगी के इसी उतार-चढ़ाव में दो नन्ही फूल सी बेटियों की किलकारी से  मेरा घर आंगन चहकने लगा 
     अब वक्त के साथ लगभग मेरे सपनों में  धुंध सी जमने लगी थी कभी-कभी धुंध  हटती भी तो परिवार और समाज की जिम्मेदारियों की चादर सब ढाप देती ......सच कहूं तो फुर्सत ही कहां मिलती है ......पीछे मुड़कर देखने की..... बेटियां चंदा सी बढ़ने लगी .....उचित घर वर देखकर उनकी पसंद से उनको भरे मन से विदा किया ......
        कब मैं समय के पायदान पर चढ़ते चढ़ते जिम्मेदारियों की गठरी लादे इतना आगे बढ़ गया कि कभी पीछे मुड़कर देखा ही नहीं .....
            आज इतने बरसों बाद .... मै  अनमना सा पीछे मुड़कर जो देखता हूं ....मेरे चेहरे पर अनगिनत रंग आते जाते रहे... 
     आज मै बालकनी में खड़े देखता हूं ....स्कूटर ,मोटरसाइकिल पर आते जाते हुए लोगों को .....तो सोचता हूं....इतनी भगदौड़ , इतनी आपाधापी....आखिर किसलिए....जब कभी मुड़कर पीछे देखना ही नहीं.... और मै ख्यालों में खोया  सबको खड़ा कर देता हूं .....एक समय के बाद एक कतार में..... जहां आज मै स्वयं खड़ा हूं....

Dr नीलम गुप्ता "नीरा"


सोमवार, 31 अक्टूबर 2022

हार की जीत




 
       काली अंधेरी रात .....खुला आसमान और तारे टिमटिमा रहे हैं बेफिक्र से... हर तरफ सन्नाटा.... हो भी क्यों ना ........लोग दिन भर की थकान से थक कर सो जो गए ..... भला रात के 2:00 बजे वैसे भी कौन जागता है.....।
    पर मेरी नींद मुझ से कोसों दूर ......सच कहूं तो ......अब तो रात भर जागने की एक आदत सी हो गई थी...... एक नियम सा बन गया था ......पर आज कुछ बेचैनी सी महसूस हो रही थी .......
इसी कारण मैं उठकर बाहर बालकनी में आकर खड़ी हो गई....... दूर तलक फैला सन्नाटा और अंधेरा .......और ......उस स्याह अंधेरे में कुछ खोजती सी.....मेरी आंखें 
        पहुंच गई आज से 20 वर्ष पहले जब ना अंधेरा था और ना ही सन्नाटा.... हर तरफ चहकता सा मधुर संगीत था....
          तब मैं 20 वर्ष की थी... जब लाल सुर्ख रंग का लहंगा पहने , भरे हाथ चूड़ियों के ....मांग में चटक सिंदूर लगाएं.... दुल्हन बन अपने बांके सजीले सपनों के राजकुमार के साथ इस घर में आई थी..... तब गूंज रहा था पूरा घर मेरी पायल की  झंकार से .....उस वक्त मुझे खुद से ही रश्क हो रहा था .....इतना स्मार्ट गोरा और सधी हुई कद - काठी का हमसफर पाकर ....।   तब मैं ही तो थी दुनिया की सबसे भाग्यशाली  युवती ......
      सभी कुछ सामान्य से बेहतर चल रहा था ....और चाहिए भी क्या एक युवती को प्यार करने वाला  .....उसकी हर ख्वाहिश को हाथों हाथ लेने वाला पति.... दिन तो मानो पंख लगा कर उड़ रहे थे ...
       पर हम तो इंसान हैं ना..... कब तक उड़ते पंख लगा कर.... यथार्थ को तो जीना ही पड़ता है... हर वक्त एक सा नहीं रहता....परिवर्तन तो प्रकृति का शाश्वत नियम है.... कभी तो नया भी पुराना होता है.... कलई तो उतरती ही है ना.....
          सच ही तो है वक्त कहां रुकता है .....और अच्छा वक्त तो मानो पंख लगाकर उड़ जाता है.... शादी को यही कोई सात - आठ  महीने ही बीते होंगे ......एक दिन घर पर कुछ मेहमान आए हुए थे...…बातों ही बातों में उन्होंने मेरी सुघड़ता और सुंदरता के पुल बांधने शुरू कर कर दिए .....मेरे साथी के चेहरे पर अनेकों रंग आते जाते रहे..... बात आई गई हो गई उस वक्त तो.....
       पर रात को जैसे ही सारी कलई खुल गई...... लगा जैसे किसी परी के पंख काट कर उसे जमीन पर बेरहमी से पटक दिया हो .....तभी यथार्थ से सामना हुआ दरवाजा खोला तो देखा..... नशे में धुत मेरे सपनों का राजकुमार खड़ा था वमुश्किल उसे अंदर कर दरवाजा बंद किया तो .....उन्होंने गाली और न जाने क्या-क्या बोलना शुरु कर दिया ......ये सब मेरे लिए इतना अप्रत्याशित था जैसे किसी ने मेरे कानों में तो जैसे गरम शीशा उड़ेल दिया हो..... कुछ भी समझ में नहीं आया..... मैने तो कभी कल्पना भी नहीं की थी..... मैं कुछ समझ पाती या कुछ बोल पाती.... उससे पहले ही एक मजबूत हाथ मेरे गाल पर पड़ा.... मैंने अपने आप को गिरते गिरते बचाया.... मैं कुछ माजरा  समझ पाती उससे पहले ही वह बिस्तर पर गिर कर सो गए .....और मैं भी पता नहीं गीली आंखों से नींद में समा गई...।
     सुबह उठी तो सब कुछ सामान्य था अपने पास बुला कर बोले..... यार कल कुछ दोस्तों के साथ ज्यादा हो गई थी और पता नहीं तुम्हें क्या - क्या बोल दिया....सच में सॉरी यार सॉरी....
     आखिर मैं तो स्त्री ही हूं भूल गई रात की बात को .....कर लिया उनकी बात पर विश्वास ....।   पर यह क्या अब तो आए दिन यह क्रम सा बन गया .....रात को नशे में धुत और सुबह माफी का नाटक ....।             शादी को भी  साल भर से ज्यादा हो गया था..... कहो तो किससे कहूं ..... मायके में बुजुर्ग मां पिताजी और भाई की अपनी  गृहस्थी ... गरम खून 
मैं चुपचाप सब सहती रही .....पर समझ ही नहीं पाती कि .....जो आदमी दिन में इतना लाड़ प्यार जताता है ....रात में हैवानियत कहां से आती है....।
     बस  इसी चक्र के चलते मैं दो बेटों की मां बन गई .....शायद इसी उम्मीद से कि कभी तो यह सुधरेंगे ही..... हो सकता है बेटों का मुंह देख कर ही यह सुधर जाए.....पर हालात और भी बदतर होते गए..... मैं स्वयं से और यथार्थ से  लड़ती रही लगता था..... जितना उजला मेरा रंग था उतनी ही काली मेरी किस्मत....।
         धीरे-धीरे वक्त के साथ मैं भी मशीन सी बन गई ...। एक लगाव था.... वह भी तार-तार हो गया .....मैंने अपना समय अपने बच्चों को देना शुरू कर दिया ....।
   पर कुदरत को तो कुछ और ही मंजूर था.... एक दिन पता चला मेरे पति की दोनों किडनी की हालत नशे के कारण बहुत खराब है .....पर आखिर पत्नी ही हूं ना ....मन से ना सही बेमन से ही उनके जीवन की दुआ मांगने लगी और उनकी जी जान से सेवा करती ......बदले में दुत्कार और गालियों के सिवा कभी कुछ नहीं मिला ....।
          पर कुदरत का लिखा कौन टाल सकता है...। एक दिन वह दोनों बच्चों को और मुझे छोड़कर चले गए....!
      मैं टूट कर पहले ही बिखर गई थी...... पर जो भी थोड़ा बहुत मेरे अंदर था..... वह भी तार-तार हो गया...... पर ऐसे कब तक चलता मुझे बच्चों के मासूम चेहरे देखकर संभलना ही था..... कब तक यूं मातम बनाए  रखती....।
      मुझे वक्त लगा कुछ महीनों का .......संभालने में खुद को..... मजबूत किया खुद को......दिन भर स्वयं को कोसते हुए मरने की बातें सोचने वाली .....मैं .......फिर से नए आत्मवल से खड़ी होने के लिए स्वयं को संभालती रही .......आखिर जीत मेरी हुई....।    
           मैंने धीरे धीरे कारोबार संभाला और बच्चों को मां पिता दोनों की तरह परवरिश की....।            आज उसी का नतीजा है कि मेरे दोनों बेटे मुकाम हासिल कर करके अपने पैरों पर खड़े हैं....।
          दुनिया , समाज और स्वयं से लड़ते हुए आखिरकार ....मैं... हार कर भी जीत गई ......इस स्याह रात में जब सारी दुनिया सो रही है..... मुझसे नींद कोसों दूर है .....मैं बालकनी में खड़ी .....आसमान में बेफिक्र से तारे को  टिमटिमाते हुए  देखकर सोचती हूं ......जहां  जंग में खुद से हार कर....!!

Dr नीलम गुप्ता " नीरा"