आज मेरे रिटायरमेंट को पूरे 3 साल हो गए... पता ही नहीं चला कि.... ये वक्त कब निकल गया ... सच ही तो है... वक्त कब और कहां ठहरा है किसी के लिए....बस मुट्ठी में बंद रेत की तरह चुपचाप फिसल जाता है...पीछे मुड़कर देखो तो ....कुछ भी हासिल नहीं होता... हथेली पर कुछ रेत के कण चिपके रहते हैं....वो भी धीरे धीरे आखिरकार गिर ही जाते हैं.....
बस इसी उधेड़ बुन में लगा मै... बचपन में पिताजी की हिदायतों भरे ....
और ...फिर भी दोस्तों संग मस्ती भरे और शरारतों के गलियारे से निकल ..... किशोरावस्था की सीढ़ी चढ़ने लगा ... पढ़ने में मध्यम था फिर भी सामाजिक होने के कारण..... शिक्षको का प्रिय था ... मेरा स्वभाव हमेशा से ही संकोची और शर्मिला रहा...
यूं ही समय बीतता गया वक्त के साथ कदम ताल मिलाते हुए....जवानी के पायदान पर कदम रखा कालेज गया ... वहीं मित्र मंडली में मेरी एक मित्र बनी....कसमें वादे सब कुछ तो किए ....एक मुस्कान चेहरे पर ठहर गई....
पर सच कहूं तो वादे करना बहुत आसान है ....निभाना उतना ही कठिन ...कितना ही आत्मवल चाहिए ...जिसकी शायद मुझमें कमी थी....
पिताजी का डर ,पढ़ाई के बाद नौकरी की जद्दोजहद, मनचाही नौकरी ना मिलने के कारण..... कुंठा और भी बहुत सी बातें... उस वक्त लगा एक युवक होना कितनी जिम्मेदारियों भरा होता है....
वक्त का सफर बदस्तूर जारी था ...वक्त बीता लम्बे इंतजार के बाद मनचाही नौकरी भी लगी पर .......कुछ बातें कहां इंतजार की मोहताज होती है...
फिर समझो तो परिवार की जिम्मेदारियां ही सर्वोपरी होती हैं... मां पिता की उम्मीद भरी निगाहें .....
कहां मुंह मोड़ा जाता है इन सब से... नालायक बनने के लिए भी बहुत हिम्मत चाहिए...
इन सब के बीच मैने स्वयं ही सरेंडर करके ....अपने मां पिताजी के सपनों को साकार करने की जिम्मेदारी उन्हीं पर सौंप दी...
करीब एक साल बाद मां की खुशी का ठिकाना नहीं था उनकी मन पसंद बहू जो आ रही थी...
मां खुश थी पिताजी खुश थे .....घर में चहल-पहल और रौनक का वातावरण ....पर मैं ज्यों का त्यों दूर होते तमाशे को मूकदर्शक बना देखता .....आखिर वह घड़ी भी आ ही गई ....मेरे सर सेहरा बंधा और ले आया मै अपने साथ घर को लक्ष्मी बनाने वाली गृह लक्ष्मी ...…
ढोल ,मंगल - गीत , रीति रिवाज, रस्में ,हंसी - ठिठोली सब कुछ तो था..... पर मैं फिर भी अकेला का अकेला
शाम ढली रात हुई रस्मों की रस्म निभाने या कहूं मां की पसंद का सामना करने जा पहुंचा कमरे में हल्की सी चूड़ी खनकी ,पायल की आवाज हुई लाल जोड़े में लिपटी वो मेरी आहट से और भी सिमट गई ..... घूंघट उठाया तो मां की पसंद मेरी पसंद से बिल्कुल अलग थी .....
खैर जो होना था सो तो हो ही गया .....जब सौप दी अपने सपनो की बागडोर दूसरों के हाथ तो फिर नाराजगी या गुस्से का अधिकार कहां...फिर उसका भी दोष कहां....वो भी तो मेरे साथ ही बंधी है अग्नि के इर्द गिर्द सात फेरे लेकर....
अब तो दूसरों की खुशी के लिए सब कुछ निभाना ही था....... मैं जिम्मेदारी निभाता रहा मूकदर्शक बन.... वह हुकुम की बादशाह बनी घर संभालती रही.... और पारिवारिक जिम्मेदारियों को संभालती ....
जिंदगी के इसी उतार-चढ़ाव में दो नन्ही फूल सी बेटियों की किलकारी से मेरा घर आंगन चहकने लगा
अब वक्त के साथ लगभग मेरे सपनों में धुंध सी जमने लगी थी कभी-कभी धुंध हटती भी तो परिवार और समाज की जिम्मेदारियों की चादर सब ढाप देती ......सच कहूं तो फुर्सत ही कहां मिलती है ......पीछे मुड़कर देखने की..... बेटियां चंदा सी बढ़ने लगी .....उचित घर वर देखकर उनकी पसंद से उनको भरे मन से विदा किया ......
कब मैं समय के पायदान पर चढ़ते चढ़ते जिम्मेदारियों की गठरी लादे इतना आगे बढ़ गया कि कभी पीछे मुड़कर देखा ही नहीं .....
आज इतने बरसों बाद .... मै अनमना सा पीछे मुड़कर जो देखता हूं ....मेरे चेहरे पर अनगिनत रंग आते जाते रहे...
आज मै बालकनी में खड़े देखता हूं ....स्कूटर ,मोटरसाइकिल पर आते जाते हुए लोगों को .....तो सोचता हूं....इतनी भगदौड़ , इतनी आपाधापी....आखिर किसलिए....जब कभी मुड़कर पीछे देखना ही नहीं.... और मै ख्यालों में खोया सबको खड़ा कर देता हूं .....एक समय के बाद एक कतार में..... जहां आज मै स्वयं खड़ा हूं....
Dr नीलम गुप्ता "नीरा"