शुक्रवार, 13 मई 2022

मेरी माँ

एक मुलाकात मेरी ...मेरी माँ से

जब मैं थी उदर में माँ के ...वो अपने से ज्यादा रखती ख्याल मेरा
 जरा  सी अकुलाहट पर मेरी ..वो विचलित हो जाती
      😭😭😭
थोड़ा सा बड़ी हुई... पहचान भूख को मेरी झटपट सीने से लगा मेरी भूख मिटाती
पता नही कैसे मेरीे ...उंगली पकड़ चलना सिखाया  
मेरे नन्हे पैरों को  सम्बल दे आगे बढ़ना सिखाया 
 ना जाने कब खेल खेल में क ख़ ग का परिचय करवाया 
मै नादान अल्हड़ सी..बिन बात रुठ जाती..याद है मुझे आज भी..
पर फिर भी  वो झट मनुहार कर चूम लेती पलकों को मेरी
जान भी नहीं पाई मैं ...कब मुझे अच्छे बुरे का भेद करना सिखाया
 बातों ही बातों में चुपके से थमा दी मुझे संस्कारों की गठरी
 वो माँ ही थी..जिसने  एक पल भी अलग ना किया मुझे अपने से
फिर भी रख सीने पर पत्थर ...
                         😭😭😭
 झट से सौंप दी अनजाने  हाथों में मेरे जीवन की डोर ..
  वहाँ भी हरपल साया बन  साथ निभाती रही मेरा
   जब आया समझ तब छोड़ चली वो  साथ मेरा...
पता नहीं वो कैसी जादूगरनी थी...बिन कहे समझ जाती थी मुझे...
🙏🙏🙏
ढूंढ लेती वो मेरी मुस्कान में भी ...हल्की सी उदासी की धूमिल  रेखा 
वो माँ हरपल यादों में रहती है  मेरे हमसाया बन
 माँ अब तू ही बता कैसे याद करूँ तुझको ..
एक दिन में..
मेरे लिए तो हर रोज... हर पल   तू ही तू है..
कदम कदम पर तेरी बातें...तेरी सलाहें.. थाम लेती हैं..
मेरे डगमगाए कदमों को...आज भी
सच माँ ..मैं माँ बन कर भी... तुझको पल पल याद करती हूँ..
  बन्द आखों के नम कोरों से तुझको बारम्बार नमन  करती हूँ
           😭😭😭

                          #.  नीलम  "नीरा "

गुरुवार, 5 मई 2022

जिम्मेदार कौन

जिम्मेदार कौन....
जी हाँ कौन जिम्मेदार है बच्चों को बिगाड़ने में.. मेरे जेहन में ये सवाल उस वक्त उठा... जब मैं सुबह सुबह उन बच्चों को देख रही थी जो स्कूल बस से स्कूल जा रहे थे  और कुछ बच्चे पास ही स्कूल में पैदल ही जा रहे थे... 
मेरे घर के सामने से अधिकतर सभी स्कूलों की बसें निकालती हैं ...इसलिए मैं अधिकतर बच्चों के स्कूल जाने और आने के वक्त गेट से बाहर आ ही जाती हूँ... बच्चों की चहल पहल किसका  दिल नहीं मोह लेती...

           हाँ तो मैं वही बता रही थी कि  बच्चों को बिगाड़ने में माँ और पिता का ही हाथ रहता है .....ये बात कुछ लोगों को बुरी और अटपटी जरुर लगेगी ..पर मेरे नजरिये से मुझे तो सही लगी... क्योंकि मैं लगभग रोज ही देखती हूँ बच्चे स्कूल जा रहे होते हैं और उनके माता पिता कंधे पर उनका स्कूलबैग लादे होते हैं... और बच्चा शैतानी करता हुआ बेफिक्र चलता है...
 आज जब एक ऐसे ही माँ को बोला..... तो उनका जबाब था...बैग भारी है..ये थक जाएगा...
मुझे जबाब अजीब लगा पर आदतानुसार 
फिर मैंने कहा .. आप स्वंय ही अपने बच्चे को बिगाड़ रही हैं... उसे उसकी जिम्मेदारी तो उठाने दीजिये..कल तो फिर आप ही कहेंगी ...

मैं सोचने पर विवश हो गयी और तभी  लगा जब हम अपने छोटे बच्चों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास ही नहीं कराएंगे तो वो नासमझ समझेंगे कैसे....वो तो वही समझेंगे जो हम समझाएंगे...
         ये बात ठीक है कि हमारा अतिशय स्नेह होता है बच्चों पर 
तो क्या हम उनको उनके काम  से अलग कर दें...
ईश्वर में हमें माता पिता बना कर बहुत बड़ा दायित्व सौंपा है..तो हमारा भी फर्ज बनता है कि अपने बच्चों को एक अच्छी परवरिश के साथ जिम्मेदारी उठाना भी सिखाएं...
आज वो छोटा सा स्कूल बैग उठाएंगे ...ऐसे ही धीरे धीरे आगे बढ़ेंगे...
बच्चों को प्यार स्नेह दुलार भरपूर दीजिये पर अच्छी शिक्षा भी दीजिये ..क्योंकि यही छोटी छोटी बातें आगे चलकर फायदेमंद या नुकसानदेह हो सकती है... 
तभी तो कहा है ...बच्चे की पहली पाठशाला घर है और पहले गुरु माता पिता☺️

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

मंगलवार, 19 अप्रैल 2022

डाकियाअब कहाँ हैं

 डाकियाअब कहाँ हैं वो डाकिये वाले दिन .... घण्टों इंतजार रहता था....टकटकी बन्धी रहती थी देहरी पर..जरा सी आहट पर कदम चल पड़ते थे...धडकनों का संगीत  सुनाई देने लगता था... गालों पर बेमौसम गुलाल बिखर जाया करता था....नजरों का काजल  अधखिला कमल हो जाया करता था... हर काम बेमानी लगता था उस इंतजार में.... सच...  डाकिये का इंतजार बड़ा ही रूमानी लगता था... कहाँ गए वो डाकिये वाले दिन..

बुधवार, 2 मार्च 2022

ये स्त्री

ये स्त्री है जनाब...
बिखर बिखर कर निखरती है...
 टूट टूट कर सबको जोड़ती है...
मुँह में पल्लू का कोना ठूसे...
मौन आँखों से बोलती है...
ये स्त्री है जनाब...

 पीड़ा में भी मुस्कुराती है
 मौन हर दंश झेलती पर ...
 अपने चीत्कार को खुद ही सुनती 
 कोरों की नमी में भी मुस्कुराती 
ये स्त्री है जनाब....

ये वो नेह का धागा है
जो पिरोती रिश्तों को
 कैसे कह दूँ साहब 
ये कोमल सी छुई मुई 
 नार नवेली कमतर है किसी से...
 तभी तो कहा....
ये स्त्री है जनाब....

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022

उलझन

ए सुनो....
   बस एक बार मिल लो ...
बहुत कुछ उलझा है तुम संग...
 वही उलझन सुलझा लें..
बहुत सी खट्टी मीठी यादें...
बहुत सी अच्छी बुरी बातें...
बहुत से मान मनुहार के पल...
 वो तुम्हारा आँखों से बोलना...
 वो तुम्हारे मेरी हर बात को हल्के से उछलना...
 वो तुम्हारा लटों को अपने हाथ से पीछे करना...
वो पीछे से आकर आँखें बन्द करना...
 वो अभी मन भरा नहीं कहकर रोकना...
  जाते जाते मुड़कर तुम्हारा देखना...
और
वो आखिरी बार तुम्हारा बिना मुड़े चले जाना ...
बहुत सी बातें हैं... तुम आओ तो तुम
बस एक बार तुमसे उलझना है
उलझ कर तुमझे बहुत कुछ सुलझाना है....
समझ रहे हो ...ना तुम 
सब कुछ सुलझाने के लिए...
जरूरी है तुमसे उलझना...

# डॉ नीलम गुप्ता  "नीरा"

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

प्रेम

प्रेम

प्रेम अनन्त है 
वही प्रेम सूक्ष्म है
प्रेम धरा है
 तो वही प्रेम आकाश है
प्रेम प्रतीक्षा है...
प्रेम कोरो की नमी तो....
वहीं प्रेम स्निग्ध मुस्कान है..
ओस की बूँदों सा
सूर्य की पहली किरन सा प्रेम 
सच अपरिभाषित सा प्रेम....

जरूरत कहाँ है... प्रेम को शब्द की
किसी अभिव्यक्ति की .....
प्रेम अनन्त विस्तार है
कहाँ है प्रेम की सीमा .....
प्रेम अंतर्मन का अनन्त अहसास 
जिसे पढ़ा नही जाता
शब्दों के मोती में गूँथ कर
माला  नहीं बनाई जा सकती
व्यक्त  नहीं किया जाता 
शब्दों की परिधि से परे प्रेम
एक अनगढ़ सा अहसास प्रेम
बन्द आँखों में सिमटा प्रेम
 रूह से रूह में समाया हुआ 
अव्यक्त सा... प्रेम 
 मेरा ही प्रेम है...
और 
मैं  प्रेममय  प्रेमी  हूँ....

डॉ नीलम गुप्ता " नीरा"

वो मेरी गुड़िया

दास्ताँ -ए- जिन्दगी
Happy taddy Day 

Dear Friends....चलिए जमाने के साथ कदमताल मिलाकर अंग्रेजियत के साथ आगे बढ़ते हुए मनाते हैं टेडी डे....
पर एक बात बताऊँ ...
कितने भी महंगे टेडी ले लो पर जो आनन्द खुशी माँ के हाथ की बनी कपड़े की गुड़िया में मिलती थी वो कहीं नही मिलती ....
याद है ना वो सूट के बचे कपड़े की गुड़िया 
काले बटन से आँखे, लाल धागे से होठ, और स्वेटर के बचे ऊन से उसके बाल....और उसकी लम्बी सी चोटी...
 सच कहूँ तो बहुत याद आती है  वो गुड़िया
 छुट्टी बाले दिन  ...
हम बच्चों की टोली में बंट जाना
और गुड़िया गुड्डे का व्याह रचाना
 कुछ मांग कर और कुछ अपने हिस्से से छिपा कर
बिस्कुट और नमकीन की दावत करना ....
पता नहीं कितने ही किस्से...

सच कहती हूं.....
देख कर गुड़िया को आज भी खो जाती हूँ बचपन में
ये आज के टेडी रंग बिरंगे नरम से बहुत सुन्दर हैं ....
मन को लुभाते भी बहुत हैं ....
पर...
माँ के हाथ की  नये पुराने कपड़ों से बनी ....
ऊन के लम्बे बालों वाली ...
बड़ी बड़ी कजरारी आँखों वाली ....
वो गुड़िया ....
आज के मंहगे टेडी पर रौब जमाती है....
टिकता नहीं टेडी उस भोली भाली मासूम सी दिलकश " गुड़िया " के आगे....

#  डॉ नीलम गुप्ता  " नीरा "