शनिवार, 8 जनवरी 2022

स्त्री

सुनो.स्त्री
मानता हूँ       मैं ..
कि तुमसे कम हूँ 
शायद कमतर भी हूँ..   पर ...
ये कोई मेरी कमजोरी नहीं...
ये तो रिश्तों को खुद से ज्यादा 
सम्भालने की मेरी कोशिश है...




सुनो ….स्त्री
ये भी मानता हूँ       मैं..
कि तुम्हारे जितना
नाजुक कोमल और स्नेहिल नहीं हूँ 
और शायद बन भी ना पाऊँ
पर ये भी मेरी कोई कमजोरी नहीं
ये तो रिश्तों को सम्भल बन
एक मजबूत नीव  बनाने की मेरी
पुरजोर कोशिश है...

सुनो.... स्त्री
मैं ये भी मानता हूँ....
जब भी मैं टूटता हूँ बिखरता हूँ
मुझे भी जरूरत होती है...
स्नेहिल सहारे की...
जो निःस्वार्थ लगा ले सीने से
एक माँ की तरह , बहन की तरह,
प्रेमिका की तरह भर ले अपने आगोश में...
जिससे मैं फिर नए जोश से
खड़ा हो सकूँ सम्भल बनने के लिए...

सुनो..…स्त्री
तुम हर तरह से आँकना मेरे वजूद को
पर ...
कभी सवाल ना खड़े करना मेरे 
पुरुषार्थ पर...मेरे पौरूष पर
कभी तुम ये दम्भ ना भरना
कि तुम सर्वस्व हो और 
मैं तिनका भी नहीं...
मेरे अस्तित्व का कुछ अस्तित्व ही नहीं...
क्योंकि..
सुनो ....स्त्री
चिन्दी सा ही वजूद है मेरा चाहे तेरी जिन्दगी में
पर ये मत भूल कि मेरे बिना तू पूरी भी नहीं है...


डॉ नीलम गुप्ता

गुरुवार, 23 सितंबर 2021

निःशब्द

निःशब्द

जिन्दगी में उतार चढ़ाव तो आते ही रहते हैं ..यही है जिन्दगी ...परन्तु फिर भी कभी कभी जीवन में ऐसी घटनाएं
घटती हैं जिनके बारे में कह पाना आसान नहीं होता या यूँ कहिए तो हम पूरी तरह निःशब्द हो जाते हैं | हमारे पास कहने को बहुत कुछ होता है फिर भी दिल चुप हो जाना चाहता है...किंग्कर्तव्य विमूढ़ से हम स्वयं को अनिश्चय की स्तिथि में पाते हैं...||

कभी कभी  हमें प्रकृति भी दिखाती हैहमें ऐसे अद्भुत नजारे जिसमे हम स्तब्ध होकर खो जाते हैं हमारे पास कहने के कुछ बचता ही नहीं है.. हम अपलक निहारते हैं उस मंजर को …. उन अविस्मरणीय दृश्यों को देख  कल्पना मात्र से हमारा मन मयूर पुलकित हो झूमने लगता है...जैसे इंद्र धनुष के रंगों का मिलकर आसमान में बिखर अदभुत छटा बिखेरना...बिना  रुके काले बादलों का भागते जाना...पुरवाई पवन का लहराते पेड़ो से बातें करना,पहाड़ की अनंत ऊँचाइयों से झरनों का निरंतर बहते जाना,चहकते  हुए  पंछियों का आपस में बातें करना,नदियों का कल कल ध्वनि करते अविरल बहते जाना ....बारिश होते होते सुनहरी धूप का चमकना...और भी बहुत कुछ ....!!

इतना ही नहीं इसके अलावा भी बहुत से लम्हें ऐसे होते हैं जो हमें निःशब्द कर जाते हैं जैसे-किसी इंसान का सोच से परे काम कर जाना,हृदयस्पर्शी कविताओं का मूल भाव समझ जाना.... दरअसल निःशब्द होना भी सबकी प्रकृति नहीं होती,जो किसी के मर्म को समझ पाए सच्चे मायने में यही          निःशब्द होता है...|

 सच कहूँ तो....
जीवन मे वैसे तो प्रतिपल हमारे आसपास कुछ ना कुछ घटित होता ही रहता है परंतु हमारी सोच से परे आकस्मिक होने वाली सुखद और दुखद घटनाएं ..जब हम कहना तो बहुत कुछ चाहते हैं... पर कह नहीं पाते....तब ऐसा नहीं है कि हमारे पास शब्द नहीं होते ...परन्तु उन शब्दों को व्यक्त नहीं कर पाते ...अपने मनोभावों को शब्दों की माला कहूँ या फिर शब्दों का जामा नहीं पहना पाते ...यही है "निःशब्द


मंगलवार, 21 सितंबर 2021

व्यक्तित्व

आप अपने आप को एक व्यक्ति के रूप में कैसे वर्णित करते हैं?
 जीवन में आपकी प्राथमिकताएं क्या हैं? 

➡️स्वंय के व्यक्तित्व का अवलोकन करना वो भी स्वयं आसान नहीं होता ...क्योंकि हम कितने भी निष्पक्ष रहें फिर भी कहीं ना कहीं चूक हो ही जाती है |  फिर भी मैं यथासम्भव प्रयास करूँगा कि मैं स्वयं का निष्पक्ष अवलोकन करूँ |
सच कहूँ तो हमारी पहचान हमारे व्यक्तित्व से ही होती है  | और हमारा व्यक्तित्व हमारे मन में उठ रहे सकारात्मक और नकारात्मक विचारों द्वारा ही सँवरता और निखरता है |इन्ही सकारात्मक और नकारात्मक विचारों में तालमेल बैठता हुआ मैं स्वयं को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखता हूँ ..जो कि माँ के संरक्षण में रहते हुए... उनके द्वारा दिये हुए संस्कारों और उनकी आर्थिक स्थिति को देखकर एवं महसूस करके मैं उनके लिए मजबूत सम्बल के रूप में हमेशा ही उनके साथ खड़ा रहूँ |
इतना ही नही मुझे लगता है कि मैं परिस्थितियों से सामंजस्य स्थापित करने वाले  एवं अपने विचारों को सही दिशा देने वाले  युवा के रूप में निखर रहा हूँ |
कभी- कभी मैं सरल सहज और शान्त स्वभाव का होते हुए भी आक्रोशित हो जाता हूँ शायद यह मेरी युवावस्था के का प्रभाव है | परन्तु फिर भी मैं स्वयं को समय और परिस्थितियों से तालमेल बैठाने वाला और यथासम्भव दूसरों के  मनोभावों को समझ सम्मान करने वाले युवा के रूप में देखता हूँ |

2:-  अब मैं बात करता हूँ प्राथमिकता की..तो जहाँ तक प्राथमिकता का सवाल है जीवन में वैसे तो समय , परिस्थिति एवं उम्र के हिसाब से प्राथमिकतायें बदलती रहती हैं |
लेकिन जहाँ तक मेरी इस वक़्त की प्राथमिकता का सवाल है  तो मैं अपने लक्ष्य को पाने के लिए एकाग्रता पूर्वक प्रयत्नशील रहते हुए समय का सदुपयोग करूँ ...क्योंकि बीता हुआ समय वापस नहीं आता  | बस इसी बात को ध्यान में रखते हुए भरसक प्रयत्न करूँ जिससे कि निकट भविष्य में मैं अपने परिवार एवं समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह ईमानदारी और कुशलता पूर्वक स्वयं के  संयत रखते हुए कर सकूँ | जिससे  कि भविष्य में मैं अपने देश और समाज में एक जिम्मेदार नागरिक बन कर लोगों में एक उदाहरण के रूप में पेश कर सकूँ  |

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

कहानी की कहानी

हाँ शौक है मुझे लिखने का...और वो भी कहानियाँ...जब भी  सोचता हूँ किसी नयी कहानी के बारे में ..हर कहानी के अंदर से एक कहानी निकल जाती है.. उस कहानी में उलझी रहती है ढेरों कहानियाँ... और सब लिपटी रहती है आपस में एक दूसरे से गुँथी सी....
सच कहूँ तो कहानियों का संसार देख मैं स्वंय उलझ जाता हूँ... मुझे लगता है कि मै स्वंय एक कहानी हो गया हूँ .सच ही तो है... मैं भी एक कहानी जैसा ही हूँ... और मुझे जुड़ी है छोटी छोटी हजारों कहानियाँ... शायद तभी मैं कहानी लिखता हूँ....
कहानियाँ कुछ अच्छी और कुछ  बुरी.. कुछ डरावनी तो कुछ ऐसी कि लगता है कहानी सच ही है...पर एक बात तो है इन कहानियों का संसार कितना भी बड़ा हो पर  सब में इतना जुड़ाव होता है कि हर कहानी अपने अंदर एक सीख ,एक उद्देश्य लिए रखती है.... हर कहानी का एक बजूद होता है...
बस तभी तो जुड़ाव है मेरा कहानियों से...और जब भी थोड़ा वक्त मिलता है.... मैं लिखने बैठ जाता हूँ ...कहानी.खो जाता हूँ एक नयी कहानियों की दुनिया में....

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"

प्रेम

प्रेम

यह प्रेम... अनुबंध है अलिखित,मौन सा
निर्झर अश्रुओं का बहता हुआ
सहज सुख सा

समर्पण है सात्विक निर्मल जल सा... 
चिंतन वंदन है प्रभु के जैसा 

प्रेम विश्वास है अहसास है परम् सत्य
अटल है... वट ...जैसा

अभिनंदन है विरह सुख के जैसा ...
अबोध क्रदन है .. वियोग का... 

ना दिखा हो कदाचित् तुम्हें....
 परंतु 
चित्त में तो तुम्हारे भी छोड़ गया होगा
मेरा प्रेम अपना अंश... दो बूँद अमिय सा...

रविवार, 11 जुलाई 2021

वो फूल..

वो फूल जो  किताबों में रखे जाते हैं 
वो कभी सूखते नहीं हैं...
 समेटे रखते हैं अपने अंदर यादों की नमी को
तभी तो जब भी देखो ताजगी से लबरेज मिलते हैं
  मयस्सर नही उनको किसी का साथ
फिर भी यादों की गठरी खुद ही ढोते हैं...
ना जाने कितने अल्हड़  पलों को अपने अंदर 
खामोशी से दबाए किताबों में बंद पड़े हैं...
पर फिर भी...
अपनी भीनी सी महक से सरोबार आज भी करते हैं
यही तो वो फूल हैं...जो किताबों में बंद हैं
जब भी फुर्सत में पलटी जाती हैं  वो किताबें
 आँखों में कोरों में चमकने लगती हैं वो 
मोती सी ओस की बूंदें...
तभी तो...जब भी खोलो किताबें...
वो उनमें रखे वो फूल सूखते नही...

डॉ नीलम गुप्ता "नीरा"