शनिवार, 7 जून 2025

Ankur

तुम मुझे अखबार जैसे पढ़ोगे
तो रद्दी हि समझोगे।
अगर तुम किताब जैसे पढ़ो
तो मेरी किमत पता चले।
............@dhul 

जिंदगी

हँसता हुआ, 
एक दिन जहां मे बिखर जाऊँगा 
ये न पुंछो बिखर कहा जाऊँगा ।
मेरा कतरा कतरा इस जहां पर होगा
पर उन कतरो मे कोई मुझे नही पायेगा । 

जिंदगी

 जिंदगी के कशमकश दौड़ में 
कागज की नाव बनाना भूल गए।
दुनिया जानने के चक्कर में 
खुद को भी हम भूल गए ।
बारिश का जब पानी गलियों में बहता है
उस बहते पानी में कागज की नाव बहाना भूल गए।
इस जिंदगी में बहुत लोगो को जाना हमने
पर कुछ अपनो को ही भूल गए।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
                     ............. @dhul 

                            

जिंदगी और मौत का गुरूर

हम भी गुरूर मे है
मौत भी गुरूर मे है
हम भी दौड़ मे है
मौत भी दौड़ मे है
हम दोनो के बीच मे 
बस फर्क है इतना 
हम जिंदा रहने कि दौड़ मे है
मौत मुझे मारने कि दौड़ मे है
मौत भी जीत गई है
हम भी जीते हुए है
हम दोनो कि जीत मे
 वो मुझे मारकर के है जीती
हम लोगो के दिल मे
जिंदा रहकर के है जीते
हम भी गुरूर मे है
मौत भी गुरूर मे है।

                                        अंकुर गुप्ता 

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2025

जिंदगी

जिंदगी की तलाश में हम
घर से कितना दुर आ गये।
एक खुशी के लिए
घर छोड़कर आ गये।‌‌‌

मंगलवार, 26 नवंबर 2024

मैं उतार रही थी रंग धीरे धीरे कैनवास पर तेरी यादों के...
और खुद हो रही थी बेरंग ...
बिखरा पड़ा था आसमान में स्याह रंग...
पर मेरी आँखों में छाया था वो लाल रंग...
उमड़ते घुमड़ते बादलों में हो रही थी कुछ गहमा गहमी..
पर आँखों में लगी थी झड़ी बरसात की...
हर तरफ फैल रही थी धूप की तपस..
पर दिल की तपन का कोई छोर ना था...
तेरी यादों का सफर इतना लंबा तो ना था..
कि हौले हौले तन्हा कर जाए...
यूँ तो वक्त गुजर कर अपने आगोश में ले रहा था...
पर  वक्त के फासले मुझे दूरियां गिना रहे थे...
फिर भी...
 उतार रही थी रंग धीरे धीरे कैनवास पर तेरी यादों के...
और खुद हो रही थी बेरंग...
क्योकि ...
तुम्हारी बेरंग यादों के रंग में " रंगने " का मजा ही कुछ औऱ है...

#   नीलम " नीरा "

गुरुवार, 1 अगस्त 2024

मेरी अभिलाषा

अभिलाषा मन की

उम्र की दहलीज पर आकर 
मन करता है ....आज
कुछ लम्हे ,कुछ पल जिऊं...
 अपने लिए...
दिल में एक कोना ऐसा रखूं
अपने लिए...
 जहां राज हो मेरा खुद का
जहां चले बादशाहत मेरी...
बेगम मैं तो बादशाह भी में ही...
मैं ही चाकर तो खानसामा भी में ही...
रखूं बंद पट उनके लिए जो...
लगाए मुखौटा अपनेपन का ....
चले आते हैं बिन दस्तक दिए....
..............
सच....
मन करता है मेरा आज...
रखूं दिल में एक कोना ऐसा अपने लिए....
जहां बैठ मैं राज करूं...
बैठ सुकून से .....
बात करूं में खुद से खुद की..
ना कोई बंदश, ना कोई रोक हो
झूमती फिरूं मैं....
अपने दिल के आंगन में....
चलाऊं अपनी मन मर्जियां...
उस कोने के हर दरो दीवार पर..
नाम अंकित हो मेरा...
 ...........
सच...
बड़ी ख्वाहिश है मेरी...
उम्र की दहलीज पर आकर...
दिल का एक कोना अपने नाम करूं....
भुला कर शिकवे गिले पुराने..
फिर से एक नयी शुरुआत करूं....
 
 नीलम गुप्ता " नीरा"