अभिलाषा मन की
उम्र की दहलीज पर आकर
मन करता है ....आज
कुछ लम्हे ,कुछ पल जिऊं...
अपने लिए...
दिल में एक कोना ऐसा रखूं
अपने लिए...
जहां राज हो मेरा खुद का
जहां चले बादशाहत मेरी...
बेगम मैं तो बादशाह भी में ही...
मैं ही चाकर तो खानसामा भी में ही...
रखूं बंद पट उनके लिए जो...
लगाए मुखौटा अपनेपन का ....
चले आते हैं बिन दस्तक दिए....
..............
सच....
मन करता है मेरा आज...
रखूं दिल में एक कोना ऐसा अपने लिए....
जहां बैठ मैं राज करूं...
बैठ सुकून से .....
बात करूं में खुद से खुद की..
ना कोई बंदश, ना कोई रोक हो
झूमती फिरूं मैं....
अपने दिल के आंगन में....
चलाऊं अपनी मन मर्जियां...
उस कोने के हर दरो दीवार पर..
नाम अंकित हो मेरा...
...........
सच...
बड़ी ख्वाहिश है मेरी...
उम्र की दहलीज पर आकर...
दिल का एक कोना अपने नाम करूं....
भुला कर शिकवे गिले पुराने..
फिर से एक नयी शुरुआत करूं....
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें