सोमवार, 25 मई 2020

कौन तुम मेरे हृदय में -महादेवी वर्मा

कौन मेरी कसक में नित,
मधुरता भरता अलक्षित?
कौन प्यासे लोचनों में,
घुमड़ घिर झरता अपरिचित?

स्वर्ण-स्वप्नों का चितेरा,
नींद के सूने निलय में!
कौन तुम मेरे हृदय में?

अनुसरण नि:श्वास मेरे,
कर रहे किसका निरन्तर?
चूमने पदचिह्न किसके,
लौटते यह श्वास फिर फिर!

कौन बन्दी कर मुझे अब,
बँध गया अपनी विजय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?

एक करूण अभाव में चिर-
तृप्ति का संसार संचित,
एक लघु क्षण दे रहा,
निर्वाण के वरदान शत शत!

पा लिया मैंने किसे इस,
वेदना के मधुर क्रय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?

गूँजता उर में न जाने
 दूर के संगीत सा क्या?
आज खो निज को मुझे
          महादेवी वर्मा 

दीपक पर पतंग-महादेवी वर्मा

दीपक में पतंग जलता क्यों?
प्रिय की आभा में जीता फिर
 दूरी का अभिनय करता क्यों
 पागल रे पतंग जलता क्यों

 उजियाला जिसका दीपक है
 मुझमें भी है वह चिनगारी
 अपनी ज्वाला देख अन्य की
 ज्वाला पर इतनी ममता क्यों

 गिरता कब दीपक दीपक में
 तारक में तारक कब घुलता
 तेरा ही उन्माद शिखा में
 जलता है फिर आकुलता क्यों

 पाता जड़ जीवन जीवन से
 तम दिन में मिल दिन हो जाता
 पर जीवन के आभा के कण
 एक सदा भ्रम मे फिरता क्यों

 जो तू जलने को पागल हो
 आँसू का जल स्नेह बनेगा
 धूमहीन निस्पंद जगत में
 जल-बुझ, यह क्रंदन करता 
दीपक में पतंग जलता क्यों?
          
                महादेवी वर्मा

  

जाग-जाग सुकेशिनी री!-महादेवी वर्मा

Mahadevi Verma: The Modern Meera | The Dispatch
जाग-जाग सुकेशिनी री!

अनिल ने आ मृदुल हौले
 शिथिल वेणी-बन्धन खोले
 पर न तेरे पलक डोले
 बिखरती अलकें, झरे जाते
 सुमन, वरवेशिनी री!

छाँह में अस्तित्व खोये
 अश्रु से सब रंग धोये
 मन्दप्रभ दीपक सँजोये,
पंथ किसका देखती तू अलस
 स्वप्न - निमेषिनी री?
Mahadevi Verma | Modern Meera of India | Prakhar Jeevan
रजत - तारों घटा बुन बुन
 गगन के चिर दाग़ गिन-गिन
 श्रान्त जग के श्वास चुन-चुन
 सो गई क्या नींद की अज्ञात-
पथ निर्देशिनी री?
Mahadevi Verma: The Modern Meera | The Dispatch

दिवस की पदचाप चंचल
 श्रान्ति में सुधि-सी मधुर चल
 आ रही है निकट प्रतिपल,
निमिष में होगा अरुण-जग
 ओ विराग-निवेशिनी री?

रूप-रेखा - उलझनों में
 कठिन सीमा - बन्धनों में
 जग बँधा निष्ठुर क्षणों में
 अश्रुमय कोमल कहाँ तू
 आ गई परदेशिनी री?
महादेवी वर्मा की कहानी बिबिया Mahadevi ...

         महादेवी वर्मा

किसी का दीप निष्ठुर हूँ-महादेवी वर्मा

सब आँखों के आँसू उजले -महादेवी वर्मा
महादेवी वर्मा
कविमहादेवी वर्मा
जन्म26 मार्च, 1907
जन्म स्थानफ़र्रुख़ाबाद, उत्तर प्रदेश
मृत्यु22 सितम्बर, 1987
मृत्यु स्थानप्रयाग, उत्तर प्रदेश
मुख्य रचनाएँमेरा परिवार, स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी, शृंखला की कड़ियाँ, अतीत के चलचित्र, नीरजा, नीहार
शलभ मैं शापमय वर हूँ!
किसी का दीप निष्ठुर हूँ!

ताज है जलती शिखा;
चिनगारियाँ शृंगारमाला;
ज्वाल अक्षय कोष सी;
अंगार मेरी रंगशाला ;
नाश में जीवित किसी की साध सुन्दर हूँ!

नयन में रह किन्तु जलती
 पुतलियाँ अंगार होंगी;
प्राण में कैसे बसाऊँ
 कठिन अग्नि समाधि होगी;
फिर कहाँ पालूँ तुझे मैं मृत्यु-मन्दिर हूँ!

हो रहे झर कर दृगों से
 अग्नि-कण भी क्षार शीतल;
पिघलते उर से निकल
 नि:श्वास बनते धूम श्यामल;
एक ज्वाला के बिना मैं राख का घर हूँ!

कौन आया था न जाने
 स्वप्न में मुझको जगाने;
याद में उन अँगुलियों के
 है मुझे पर युग बिताने;
रात के उर में दिवस की चाह का शर हूँ!

शून्य मेरा जन्म था,
अवसान है मुझको सबेरा;
प्राण आकुल से लिए,
संगी मिला केवल अँधेरा;
मिलन का मत नाम ले मैं विरह में चिर हूँ!

                     महादेवी वर्मा 

सब आँखों के आँसू उजले-महादेवी वर्मा

MahadeviVarma Instagram posts - Gramho.com
सब आँखों के आँसू उजले 
 सबके सपनों में सत्‍य पला!

जिसने उसको ज्‍वाला सौंपी
 उसने इसमें मकरंद भरा,
आलोक लुटाता वह घुल-घुल
 देता झर यह सौरभ बिखरा!

दोनों संगी, पथ एक, किंतु 
 कब दीप खिला कब फूल जला?
Rebel with a pause: The rugged landscape of Mahadevi Verma ...
वह अचल धरा को भेंट रहा
 शत-शत निर्झर में हो चंचल,
चिर परिधि बन भू को घेरे
 इसका उर्मिल नित करूणा-जल

 कब सागर उर पाषाण हुआ, 
कब गिरि ने निर्मम तन बदला?
Mahadevi Verma: A Feminist Writer And Humanitarian ...

नभ तारक-सा खंडित पुलकित
 यह क्षुद्र-धारा को चूम रहा,
वह अंगारों का मधु-रस पी
 केशर-किरणों-सा झूम रहा,

अनमोल बना रहने को 
 कब टूटा कंचन हीरक पिघला?

नीलम मरकत के संपुट दो
 जिसमें बनता जीवन-मोती,
इसमें ढलते सब रंग-रुप
 उसकी आभा स्‍पंदन होती!
26th MARCH 1907 – 11th SEPTEMBER 1987 MAHADEVI VERMA – Film Bio

महादेवी वर्मा 

जीवन दीप-महादेवी वर्मा

Mahadevi Varma, renowned Indian poet, honoured with Google doodle ...
किन उपकरणों का दीपक,
किसका जलता है तेल?
किसकी वृत्ति, कौन करता
 इसका ज्वाला से मेल?

शून्य काल के पुलिनों पर-
जाकर चुपके से मौन,
इसे बहा जाता लहरों में
 वह रहस्यमय कौन?
Google Doodle commemorates Mahadevi Varma, leading poet of ...

कुहरे सा धुँधला भविष्य है,
है अतीत तम घोर ;
कौन बता देगा जाता यह
 किस असीम की ओर?

पावस की निशि में जुगनू का-
ज्यों आलोक-प्रसार।
 इस आभा में लगता तम का
 और गहन विस्तार।

 इन उत्ताल तरंगों पर सह-
झंझा के आघात,
जलना ही रहस्य है बुझना -
है नैसर्गिक बात ! 
      Vajiram & Ravi - Google Doodle is honouring Mahadevi Varma ...   महादेवी वर्मा 

उत्तर-महादेवी वर्मा

इस एक बूँद आँसू में, 
चाहे साम्राज्य बहा दो,
वरदानों की वर्षा से, 
यह सूनापन बिखरा दो;
Allahabad News - Social Education Entertainment Crime and Health

इच्छा‌ओं की कम्पन से, 
सोता एकान्त जगा दो,
आशा की मुस्काहट पर, 
मेरा नैराश्य लुटा दो ।

 चाहे जर्जर तारों में, 
अपना मानस उलझा दो,
इन पलकों के प्यालो में, 
सुख का आसव छलका दो;
Mahadevi Varma - Mahadevi Varma Biography - Poem Hunter

मेरे बिखरे प्राणों में, 
सारी करुणा ढुलका दो,
मेरी छोटी सीमा में, 
अपना अस्तित्व मिटा दो!

पर शेष नहीं होगी यह, 
मेरे प्राणों की क्रीड़ा,
तुमको पीड़ा में ढूँढा, 
तुम में ढूँढूँगी पीड़ा!
The Jnanpith award celebrates Hindi writer Krishna Sobti's ...
          
महादेवी वर्मा