सोच रही हूँ....
क्या हूँ " मैं "...
" मैं "
शायद एक अनगढ़ सा पत्थर हूँ
शान्त और सपाट..निर्विकार सा....
दोस्तों अब ...
मैं ये तुम पर छोड़ती हूँ कि...
कि तुम किस स्वरूप में
मुझे ढालोगे....
तुम चाहो तो मुझे उछालो..
और फेंक दो दूसरे के शीशे के
घरों को तोड़ने के लिए...
या फिर....
मुझे तराश कर...
आकार दे..सुसज्जित कर..
देवता बना पूज लो...
ये सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी मर्जी है...
कि तुम्हारे लिए मैं क्या हूँ....
एक व्यर्थ का पत्थर या देवता..
सब तुम पर छोड़ती हूँ....
और हाँ दोस्तों .....
यदि तुम सोचते हो कि....
मैं तुम्हारे रास्ते की वाधा हूँ...
तो तुम मुझे ठोकर मार कर....
अपने रास्ते से हटा देना...
मुझ से बच कर किनारा कर लेना...
एक पल के लिए भी तुम....
विचलित मत होना...
दोस्तों ...
सब कुछ तुम पर छोड़ती हूँ....
अब देखना है....
मेरी नियति क्या है ....??
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