शनिवार, 25 मई 2024

वो काली रात.... कैसे भूलूँ उसे...
बेगानों में कितनी अपनी सी है ....
वो काली रात...
कुछ इस तरह आयी मेरे पास...
बैठ सिरहाने मेरे ...चुपके से..
मेरी ख्वाहिशों को...ओढ़ा गयी ..
अपनी स्याह चादर....

यूँ देख उसको दंग रह गयी मैं ...
उसने हौले से मुस्कुराकर जो.....
गले लगाया मुझको ....
उलझा कर अपने आँचल में मुझको ...
चुपचाप सुला गयी ...अपनी स्याह ..
चादर ओढ़ा कर मुझको...

सब्र कर लेती इतने से...गर वो ....
वादा ना करती दुबारा आने का...
पर वो हर रोज आकर...
समीप बैठ मेरे सपनों को ...
ओढ़ा जाती है अपनी स्याह चादर...

पूछती है हाल मेरा ...नम आँखों के कोरों  से....
पोछ गालों की स्याही को..आहिस्ता से..
आगोश में भर मुझको ....सुला जाती है...
अपनी स्याह चादर ओढ़ा....

उसकी मन्द मुस्कान भाने लगी है मुझको ...
अब हर रोज रहता है इन्तजार मुझको ....
उस स्याह काली रात का....
कैसे भूलूँ उस काली रात को....
जो हर रोज बड़े प्यार से.....
अपना बना कर मुझसे मिलने आती है....
मेरे सपनों को...मेरी ख्वाहिशों को...
ढक जाती है अपनी स्याह चादर से....

#   नीलम. " नीरा "

कोई टिप्पणी नहीं: