लोग समझे ही कहाँ मेरे जज्बातों को
बुरा मान बैठे मेरी बातों को
नींद खराब कर दी मेरी
और हाथ पैर तोड़ दिए रातों को/
व्याख्या
उसकी भी आस छोड़ कर चली गयी/
जिसके लिए पब्लिक
भौं फोड़,नाक तोड़ कर चली गयी/
वो बाँह छोड़ कर चली गयी/
शादी कर ली उसने
मुझे बरबाद कर चली गयी/
खुद को बेगुनाह बताया उसने
मेरे मुँह मे बदनामी ठूँस कर चली गयी/
मेरी ही गलती थी,मैंने बरगलाया था उसे
ऐसा ब्लेम कर चली गयी/
सालों तक लूटा हमींको
और मानहानि का क्लेम कर चली गयी/
बचपना था जो बहक गयी थी वो
हम क्या बुढ़ापे मे बहके थे
जो छोड़ कर चली गयी/
(राजन विघार्थी)
written-23/08/16