कोई लौटा दे मेरा बचपन
जब मैं छोटा था बुनता था ख्याब बड़े
उन ख्वाबों के ताने बाने में बना लेता था एक रंगीन दुनिया
जहां सिर्फ और सिर्फ खुशियां ही होंगी
सोचा करता था मां की गोद से निकल
उड़ूंगा तोड़ लाऊंगा हसीं सितारे ... बस बड़ा हो जाऊं...
दिन भर ढेरों सपने बुनता ....
समय बीता वक्त बीता..साल महीने दिन रात और ऋतुएं बीती...
और हुआ मेरा भी मन चाहा...
एक दिन भगवान के द्वार पर हुई मेरी सुनवाई
मैं बड़ा हो गया....
अच्छा लगा ...लगा सोचने अब मैं उड़ सकता हूं
ना कोई बंधन ... ना कोई पाबंदी खुद का राजा खुद..…
बस जीने लगा अपनी सपनों की रंगीन दुनिया में.. मैं खुश था मगन था खुद में..
पर...फिर समय बीता वक्त बीता...साल महीने दिन रात और ऋतुएं बीती...
अब में था... यथार्थ के धरातल में...
रूबरू हुआ दुनिया से... फिर मिला जिम्मेदारियों से... यारों से ..अपनों से बेगानों से...तब
लगा किसी ने पटक दिया आसमान से जमीं पर..तब देखी सपनों की दुनिया की काली तस्वीर...कांप उठा मेरा रोम रोम..
मै चिल्लाया ... मां कहां है ...छिपा ले अपने आंचल में... छांव दे दे अपने आंचल की ..सहला दे मेरे उलझे बालों को... एक चपत तो लगा दे मेरे गालों में... डांट ले मार ले मां .. मैं चुप चाप बस तेरे आंचल में लिपटा रहूंगा....
बस एक बार मेरा बचपन लौटा दे कोई...
मैं बिलखता रहा पर कौन सुनता मेरी...
क्योंकि....
वो समय बीत गया वक्त बीत गया साल महीने दिन राल ऋतुएं सब बीत गए..... सब बीत गए...
और जो बीत गया वो लौट कर नहीं आता...कभी नहीं