शनिवार, 18 जुलाई 2020

पूछो-सुभद्रा कुमारी चौहान

विफल प्रयत्न हुए सारे,
मैं हारी, निष्ठुरता जीती।
 अरे न पूछो, कह न सकूँगी,
तुमसे मैं अपनी बीती॥

 नहीं मानते हो तो जा
 उन मुकुलित कलियों से पूछो।
 अथवा विरह विकल घायल सी
 भ्रमरावलियों से पूछो॥

 जो माली के निठुर करों से
 असमय में दी गईं मरोड़।
 जिनका जर्जर हृदय विकल है,
प्रेमी मधुप-वृंद को छोड़॥

 सिंधु-प्रेयसी सरिता से तुम
 जाके पूछो मेरा हाल।
 जिसे मिलन-पथ पर रोका हो,
कहीं किसी ने बाधा डाल॥

नीम-सुभद्रा कुमारी चौहान

सब दुखहरन सुखकर परम हे नीम! जब देखूँ तुझे।
 तुहि जानकर अति लाभकारी हर्ष होता है मुझे॥
 ये लहलही पत्तियाँ हरी, शीतल पवन बरसा रहीं।
 निज मंद मीठी वायु से सब जीव को हरषा रहीं॥
 हे नीम! यद्यपि तू कड़ू, नहिं रंच-मात्र मिठास है।
 उपकार करना दूसरों का, गुण तिहारे पास है॥
 नहिं रंच-मात्र सुवास है, नहिं फूलती सुंदर कली।
 कड़ुवे फलों अरु फूल में तू सर्वदा फूली-फली॥
 तू सर्वगुणसंपन्न है, तू जीव-हितकारी बड़ी।
 तू दु:खहारी है प्रिये! तू लाभकारी है बड़ी॥
 है कौन ऐसा घर यहाँ जहाँ काम तेरा नहिं पड़ा।
 ये जन तिहारे ही शरण हे नीम! आते हैं सदा॥
 तेरी कृपा से सुख सहित आनंद पाते सर्वदा॥
 तू रोगमुक्त अनेक जन को सर्वदा करती रहै।
 इस भांति से उपकार तू हर एक का करती रहै॥
 प्रार्थना हरि से करूँ, हिय में सदा यह आस हो।
 जब तक रहें नभ, चंद्र-तारे सूर्य का परकास हो॥
 तब तक हमारे देश में तुम सर्वदा फूला करो।
 निज वायु शीतल से पथिक-जन का हृदय शीतल करो॥

प्रथम दर्शन-सुभद्रा कुमारी चौहान

प्रथम जब उनके दर्शन हुए,
हठीली आँखें अड़ ही गईं।
 बिना परिचय के एकाएक
 हृदय में उलझन पड़ ही गई॥

 मूँदने पर भी दोनों नेत्र,
खड़े दिखते सम्मुख साकार।
 पुतलियों में उनकी छवि श्याम
 मोहिनी, जीवित जड़ ही गई॥

 भूल जाने को उनकी याद,
किए कितने ही तो उपचार।
 किंतु उनकी वह मंजुल-मूर्ति
 छाप-सी दिल पर पड़ ही गई॥

प्रभु तुम मेरे मन की जानो -सुभद्रा कुमारी चौहान

मैं अछूत हूँ, मंदिर में आने का मुझको अधिकार नहीं है।
 किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥
 प्यार असीम, अमिट है, फिर भी पास तुम्हारे आ न सकूँगी।
 यह अपनी छोटी सी पूजा, चरणों तक पहुँचा न सकूँगी॥

 इसीलिए इस अंधकार में, मैं छिपती-छिपती आई हूँ।
 तेरे चरणों में खो जाऊँ, इतना व्याकुल मन लाई हूँ॥
 तुम देखो पहिचान सको तो तुम मेरे मन को पहिचानो।
 जग न भले ही समझे, मेरे प्रभु! मेरे मन की जानो॥

 मेरा भी मन होता है, मैं पूजूँ तुमको, फूल चढ़ाऊँ।
 और चरण-रज लेने को मैं चरणों के नीचे बिछ जाऊँ॥
 मुझको भी अधिकार मिले वह, जो सबको अधिकार मिला है।
 मुझको प्यार मिले, जो सबको देव! तुम्हारा प्यार मिला है॥

 तुम सबके भगवान, कहो मंदिर में भेद-भाव कैसा?
हे मेरे पाषाण! पसीजो, बोलो क्यों होता ऐसा?
मैं गरीबिनी, किसी तरह से पूजा का सामान जुटाती।
 बड़ी साध से तुझे पूजने, मंदिर के द्वारे तक आती॥

 कह देता है किंतु पुजारी, यह तेरा भगवान नहीं है।
 दूर कहीं मंदिर अछूत का और दूर भगवान कहीं है॥
 मैं सुनती हूँ, जल उठती हूँ, मन में यह विद्रोही ज्वाला।
 यह कठोरता, ईश्वर को भी जिसने टूक-टूक कर डाला॥

 यह निर्मम समाज का बंधन, और अधिक अब सह न सकूँगी।
 यह झूठा विश्वास, प्रतिष्ठा झूठी, इसमें रह न सकूँगी॥
 ईश्वर भी दो हैं, यह मानूँ, मन मेरा तैयार नहीं है।
 किंतु देवता यह न समझना, तुम पर मेरा प्यार नहीं है॥

 मेरा भी मन है जिसमें अनुराग भरा है, प्यार भरा है।
 जग में कहीं बरस जाने को स्नेह और सत्कार भरा है॥
 वही स्नेह, सत्कार, प्यार मैं आज तुम्हें देने आई हूँ।
 और इतना तुमसे आश्वासन, मेरे प्रभु! लेने आई हूँ॥

 तुम कह दो, तुमको उनकी इन बातों पर विश्वास नहीं है।
 छुत-अछूत, धनी-निर्धन का भेद तुम्हारे पास नहीं है॥

प्रतीक्षा-सुभद्रा कुमारी चौहान

बिछा प्रतीक्षा-पथ पर चिंतित
 नयनों के मदु मुक्ता-जाल।
 उनमें जाने कितनी ही
 अभिलाषाओं के पल्लव पाल॥

 बिता दिए मैंने कितने ही
 व्याकुल दिन, अकुलाई रात।
 नीरस नैन हुए कब करके
 उमड़े आँसू की बरसात॥

 मैं सुदूर पथ के कलरव में,
सुन लेने को प्रिय की बात।
 फिरती विकल बावली-सी
 सहती अपवादों के आघात॥

 किंतु न देखा उन्हें अभी तक
 इन ललचाई आँखों ने।
 संकोचों में लुटा दिया
 सब कुछ, सकुचाई आँखों ने॥

 अब मोती के जाल बिछाकर,
गिनतीं हैं नभ के तारे।
 इनकी प्यास बुझाने को सखि!
आएंगे क्या फिर प्यारे?

प्रियतम से -सुभद्रा कुमारी चौहान

बहुत दिनों तक हुई परीक्षा
 अब रूखा व्यवहार न हो।
 अजी, बोल तो लिया करो तुम
 चाहे मुझ पर प्यार न हो॥

 जरा जरा सी बातों पर
 मत रूठो मेरे अभिमानी।
 लो प्रसन्न हो जाओ
 ग़लती मैंने अपनी सब मानी॥

 मैं भूलों की भरी पिटारी
 और दया के तुम आगार।
 सदा दिखाई दो तुम हँसते
 चाहे मुझ से करो न प्यार॥

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

उल्लास-सुभद्रा कुमारी चौहान

शैशव के सुन्दर प्रभात का
 मैंने नव विकास देखा।
 यौवन की मादक लाली में
 जीवन का हुलास देखा।।

 जग-झंझा-झकोर में
 आशा-लतिका का विलास देखा।
 आकांक्षा, उत्साह, प्रेम का
 क्रम-क्रम से प्रकाश देखा।।

 जीवन में न निराशा मुझको
 कभी रुलाने को आयी।
 जग झूठा है यह विरक्ति भी
 नहीं सिखाने को आयी।।

 अरिदल की पहिचान कराने
 नहीं घृणा आने पायी।
 नहीं अशान्ति हृदय तक अपनी
 भीषणता लाने पायी।।