गुरुवार, 9 जुलाई 2020

आज सडकों पर-दुष्यंत कुमार

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख ।

 एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख ।

 अब यकीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह,
यह हक़ीक़त देख लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख ।

 वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख ।

 ये धुन्धलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख ।

 राख़ कितनी राख़ है, चारों तरफ बिख़री हुई, 
राख़ में चिनगारियाँ ही देख अंगारे न देख ।

आग जलती रहे-दुष्यंत कुमार

एक तीखी आँच ने
 इस जन्म का हर पल छुआ,
आता हुआ दिन छुआ
 हाथों से गुजरता कल छुआ
 हर बीज, अँकुआ, पेड़-पौधा,
फूल-पत्ती, फल छुआ
 जो मुझे छूने चली
 हर उस हवा का आँचल छुआ
... प्रहर कोई भी नहीं बीता अछूता
 आग के संपर्क से
 दिवस, मासों और वर्षों के कड़ाहों में
 मैं उबलता रहा पानी-सा
 परे हर तर्क से
 एक चौथाई उमर
 यों खौलते बीती बिना अवकाश
 सुख कहाँ
 यों भाप बन-बन कर चुका,
रीता, भटकता
 छानता आकाश
 आह! कैसा कठिन
... कैसा पोच मेरा भाग!
आग चारों और मेरे
 आग केवल भाग!
सुख नहीं यों खौलने में सुख नहीं कोई,
पर अभी जागी नहीं वह चेतना सोई,
वह, समय की प्रतीक्षा में है, जगेगी आप
 ज्यों कि लहराती हुई ढकने उठाती भाप!
अभी तो यह आग जलती रहे, जलती रहे
 जिंदगी यों ही कड़ाहों में उबलती रहे ।

चीथड़े में हिन्दुस्तान- दुष्यंत कुमार

एक गुडिया की कई कठपुतलियों में जान है,
आज शायर ये तमाशा देख कर हैरान है।

 ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए,
यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है।

 एक बूढा आदमी है मुल्क में या यों कहो,
इस अँधेरी कोठारी में एक रौशनदान है। 

 मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के कदम,
तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है।

 इस कदर पाबंदी-ए-मज़हब की सदके आपके
 जब से आज़ादी मिली है, मुल्क में रमजान है।

 कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला की हिन्दुस्तान है।

 मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।

मत कहो आकाश में कोहरा घना है-दुष्यंत कुमार

मत कहो आकाश में कोहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।

 सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह का,
क्या कारोगे सूर्य का क्या देखना है।

 हो गयी हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है।

 दोस्तों अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में सम्भावना है.

मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे- दुष्यंत कुमार

मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे
 इस बूढे पीपल की छाया में सुस्ताने आयेंगे

 हौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेडो मत
 हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आयेंगे

 थोडी आँच बची रहने दो थोडा धुँआ निकलने दो
 तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आयेंगे

 उनको क्या मालूम निरूपित इस सिकता पर क्या बीती
 वे आये तो यहाँ शंख सीपियाँ उठाने आयेंगे

 फिर अतीत के चक्रवात में दृष्टि न उलझा लेना तुम
 अनगिन झोंके उन घटनाओं को दोहराने आयेंगे

 रह-रह आँखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी
 आगे और बढे तो शायद दृश्य सुहाने आयेंगे

 मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता
 हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आयेंगेहम क्यों बोलें इस आँधी में कई घरौंदे टूट गये
 इन असफल निर्मितियों के शव कल पहचाने जयेंगे

 हम इतिहास नहीं रच पाये इस पीडा में दहते हैं
 अब जो धारायें पकडेंगे इसी मुहाने आयेंगे

अब तो पथ यही है- दुष्यंत कुमार

जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,
अब तो पथ यही है|

अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,
एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,
अब तो पथ यही है |

क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए, 
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है| 

यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है |

हो गई है पीर पर्वत-दुष्यंत कुमार

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
 इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

 आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
 शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

 हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
 हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

 सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
 मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

 मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
 हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए