गुरुवार, 25 जून 2020

हरी हरी दूब पर-अटल बिहारी वाजपेयी

हरी हरी दूब पर 
 ओस की बूंदे 
 अभी थी, 
अभी नहीं हैं| 
ऐसी खुशियाँ 
 जो हमेशा हमारा साथ दें 
 कभी नहीं थी, 
कहीं नहीं हैं| 

क्काँयर की कोख से 
 फूटा बाल सूर्य, 
जब पूरब की गोद में 
 पाँव फैलाने लगा, 
तो मेरी बगीची का 
 पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा, 
मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ 
 या उसके ताप से भाप बनी, 
ओस की बुँदों को ढूंढूँ? 

कौरव कौन, कौन पांडव -अटल बिहारी वाजपेयी

कौरव कौन
 कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है|
दोनों ओर शकुनि
 का फैला
 कूटजाल है|
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
 जुए की लत है|
हर पंचायत में
 पांचाली
 अपमानित है|
बिना कृष्ण के
 आज
 महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है|

दूध में दरार पड़ गई -अटल बिहारी वाजपेयी

ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया।
 बँट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई।
 दूध में दरार पड़ गई।

 खेतों में बारूदी गंध,
टूट गये नानक के छंद
 सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है।
 वसंत से बहार झड़ गई
 दूध में दरार पड़ गई।

 अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता।
 बात बनाएँ, बिगड़ गई।
 दूध में दरार पड़ गई

क्षमा याचना-अटल बिहारी वाजपेयी

क्षमा करो बापू! तुम हमको,
बचन भंग के हम अपराधी,
राजघाट को किया अपावन,
मंज़िल भूले, यात्रा आधी।

 जयप्रकाश जी! रखो भरोसा,
टूटे सपनों को जोड़ेंगे।
 चिताभस्म की चिंगारी से,
अन्धकार के गढ़ तोड़ेंगे

अंतरद्वंद्व -अटल बिहारी वाजपेयी

क्या सच है, क्या शिव, क्या सुंदर?
शव का अर्चन,
शिव का वर्जन,
कहूँ विसंगति या रूपांतर?
 
वैभव दूना,
अंतर सूना,
कहूँ प्रगति या प्रस्थलांतर?

जीवन की ढलने लगी साँझ -अटल बिहारी वाजपेयी

जीवन की ढलने लगी सांझ
 उमर घट गई
 डगर कट गई
 जीवन की ढलने लगी सांझ।

 बदले हैं अर्थ
 शब्द हुए व्यर्थ
 शान्ति बिना खुशियाँ हैं बांझ।

 सपनों में मीत
 बिखरा संगीत
 ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ।
 जीवन की ढलने लगी सांझ।

मौत से ठन गई -अटल बिहारी वाजपेयी

ठन गई! 
मौत से ठन गई! 

जूझने का मेरा इरादा न था, 
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, 

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, 
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। 

 मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, 
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं। 

 मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, 
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ? 

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ, 
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा। 

 मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र, 
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर। 

 बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं, 
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं। 

 प्यार इतना परायों से मुझको मिला, 
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला। 

 हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये, 
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए। 

 आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है, 
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है। 

 पार पाने का क़ायम मगर हौसला, 
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई। 

 मौत से ठन गई