गुरुवार, 25 जून 2020

मैं न चुप हूँ न गाता हूँ -अटल बिहारी वाजपेयी

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ 

 सवेरा है मगर पूरब दिशा में 
 घिर रहे बादल 
 रूई से धुंधलके में 
 मील के पत्थर पड़े घायल 
 ठिठके पाँव 
 ओझल गाँव 
 जड़ता है न गतिमयता 

 स्वयं को दूसरों की दृष्टि से 
 मैं देख पाता हूं 
 न मैं चुप हूँ न गाता हूँ 

 समय की सदर साँसों ने 
 चिनारों को झुलस डाला, 
मगर हिमपात को देती 
 चुनौती एक दुर्ममाला, 

बिखरे नीड़, 
विहँसे चीड़, 
आँसू हैं न मुस्कानें, 
हिमानी झील के तट पर 
 अकेला गुनगुनाता हूँ। 
 न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

एक बरस बीत गया -अटल बिहारी वाजपेयी

एक बरस बीत गया 
 
झुलसाता जेठ मास 
 शरद चांदनी उदास 
 सिसकी भरते सावन का 
 अंतर्घट रीत गया 
 एक बरस बीत गया 
 
सीकचों मे सिमटा जग 
 किंतु विकल प्राण विहग 
 धरती से अम्बर तक 
 गूंज मुक्ति गीत गया 
 एक बरस बीत गया 
 
पथ निहारते नयन 
 गिनते दिन पल छिन 
 लौट कभी आएगा 
 मन का जो मीत गया 
 एक बरस बीत गया

अपने ही मन से कुछ बोलें -अटल बिहारी वाजपेयी

क्या खोया, क्या पाया जग में
 मिलते और बिछुड़ते मग में
 मुझे किसी से नहीं शिकायत
 यद्यपि छला गया पग-पग में
 एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी
 जीवन एक अनन्त कहानी
 पर तन की अपनी सीमाएँ
 यद्यपि सौ शरदों की वाणी
 इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें!

जन्म-मरण अविरत फेरा
 जीवन बंजारों का डेरा
 आज यहाँ, कल कहाँ कूच है
 कौन जानता किधर सवेरा
 अंधियारा आकाश असीमित,प्राणों के पंखों को तौलें!
अपने ही मन से कुछ बोलें!

झुक नहीं सकते -अटल बिहारी वाजपेयी

टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

 सत्य का संघर्ष सत्ता से
 न्याय लड़ता निरंकुशता से
 अंधेरे ने दी चुनौती है
 किरण अंतिम अस्त होती है

 दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
 वज्र टूटे या उठे भूकंप
 यह बराबर का नहीं है युद्ध
 हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
 हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
 और पशुबल हो उठा निर्लज्ज

 किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
 अंगद ने बढ़ाया चरण
 प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
 समर्पण की माँग अस्वीकार

 दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
 टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

ऊँचाई -अटल बिहारी वाजपेयी

ऊँचे पहाड़ पर, 
पेड़ नहीं लगते, 
पौधे नहीं उगते, 
न घास ही जमती है। 

जमती है सिर्फ बर्फ, 
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और, 
मौत की तरह ठंडी होती है। 
खेलती, खिलखिलाती नदी, 
जिसका रूप धारण कर, 
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है। 

 ऐसी ऊँचाई, 
जिसका परस 
 पानी को पत्थर कर दे, 
ऐसी ऊँचाई 
 जिसका दरस हीन भाव भर दे, 
अभिनंदन की अधिकारी है, 
आरोहियों के लिये आमंत्रण है, 
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं, 

किन्तु कोई गौरैया, 
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती, 
ना कोई थका-मांदा बटोही, 
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है। 

 सच्चाई यह है कि 
 केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती, 
सबसे अलग-थलग, 
परिवेश से पृथक, 
अपनों से कटा-बँटा, 
शून्य में अकेला खड़ा होना, 
पहाड़ की महानता नहीं, 
मजबूरी है। 
 ऊँचाई और गहराई में 
 आकाश-पाताल की दूरी है। 

जो जितना ऊँचा, 

पुनः चमकेगा दिनकर -अटल बिहारी वाजपेयी

आज़ादी का दिन मना,
नई ग़ुलामी बीच;
सूखी धरती, सूना अंबर,
मन-आंगन में कीच;
मन-आंगम में कीच,
कमल सारे मुरझाए;
एक-एक कर बुझे दीप,
अंधियारे छाए;
कह क़ैदी कबिराय
 न अपना छोटा जी कर;
चीर निशा का वक्ष
 पुनः चमकेगा दिनकर।

क़दम मिला कर चलना होगा -अटल बिहारी वाजपेयी

बाधाएँ आती हैं आएँ
 घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढ़लना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
 क़दम मिलाकर चलना होगा।