सोमवार, 25 मई 2020

क्या जलने की रीत-महादेवी वर्मा

क्या जलने की रीति, 
शलभ समझा, दीपक जाना।

 घेरे हैं बंदी दीपक को,
ज्वाला की बेला,
दीन शलभ भी दीपशिखा से,
सिर धुन धुन खेला।

 इसको क्षण संताप, 
भोर उसको भी बुझ जाना।

 इसके झुलसे पंख धूम की,
उसके रेख रही,
इसमें वह उन्माद, न उसमें
 ज्वाला शेष रही।

 जग इसको चिर तृप्त कहे, 
या समझे पछताना।

 प्रिय मेरा चिर दीप जिसे छू,
जल उठता जीवन,
दीपक का आलोक, शलभ
 का भी इसमें क्रंदन।

 युग युग जल निष्कंप, 
इसे जलने का वर पाना।

 धूम कहाँ विद्युत लहरों से,
हैं नि:श्वास भरा,
झंझा की कंपन देती,
चिर जागृति का पहरा।
 जाना उज्ज्वल प्रात: 

 महादेवी वर्मा 

मैं बनी मधुमास आली!-महादेवी वर्मा

मैं बनी मधुमास आली!

आज मधुर विषाद की घिर करुण आई यामिनी,
बरस सुधि के इन्दु से छिटकी पुलक की चाँदनी
 उमड़ आई री, दृगों में
 सजनि, कालिन्दी निराली!

रजत स्वप्नों में उदित अपलक विरल तारावली,
जाग सुक-पिक ने अचानक मदिर पंचम तान लीं;
बह चली निश्वास की मृदु
 वात मलय-निकुंज-वाली!

सजल रोमों में बिछे है पाँवड़े मधुस्नात से,
आज जीवन के निमिष भी दूत है अज्ञात से;
क्या न अब प्रिय की बजेगी
 मुरलिका मधुराग वाली? 

मिटने का अधिकार-महादेवी वर्मा

वे मुस्काते फूल, नहीं
 जिनको आता है मुरझाना,
वे तारों के दीप, नहीं
 जिनको भाता है बुझ जाना

 वे सूने से नयन, नहीं
 जिनमें बनते आँसू मोती,
वह प्राणों की सेज, नही
 जिसमें बेसुध पीड़ा, सोती

 वे नीलम के मेघ, नहीं
 जिनको है घुल जाने की चाह
 वह अनन्त ऋतुराज, नहीं
 जिसने देखी जाने की राह

 ऐसा तेरा लोक, वेदना
 नहीं,नहीं जिसमें अवसाद,
जलना जाना नहीं, नहीं
 जिसने जाना मिटने का स्वाद!

क्या अमरों का लोक मिलेगा
 तेरी करुणा का उपहार
 रहने दो हे देव! अरे
 यह मेरे मिटने का अधिकार! 
           महादेवी वर्मा 

मेरा सजल मुख देख लेते!-महादेवी वर्मा

मेरा सजल 
 मुख देख लेते!
यह करुण 
 मुख देख लेते!

सेतु शूलों का बना बाँधा विरह-बारिश का जल
 फूल की पलकें बनाकर प्यालियाँ बाँटा हलाहल!

दुखमय सुख
 सुख भरा दुःख
 कौन लेता पूछ, जो तुम,
ज्वाल-जल का देश देते!

नयन की नीलम-तुला पर मोतियों से प्यार तोला,

कर रहा व्यापार कब से मृत्यु से यह प्राण भोला!

भ्रान्तिमय कण
 श्रान्तिमय क्षण-
थे मुझे वरदान, जो तुम
 माँग ममता शेष लेते!

पद चले, जीवन चला, पलकें चली, स्पन्दन रही चल
 किन्तु चलता जा रहा मेरा क्षितिज भी दूर धूमिल ।

 अंग अलसित
 प्राण विजड़ित
 मानती जय, जो तुम्हीं
 हँस हार आज अनेक देते!

घुल गई इन आँसुओं में देव जाने कौन हाला,
झूमता है विश्व पी-पी घूमती नक्षत्र-माला;

साध है तुम
 बन सघन तुम
 सुरँग अवगुण्ठन उठा,
गिन आँसुओं की रख लेते!

शिथिल चरणों के थकित इन नूपुरों की करुण रुनझुन
 विरह की इतिहास कहती, जो कभी पाते सुभग सुन;

चपल पद धर
 आ अचल उर!
वार देते मुक्ति, खो
 निर्वाण का सन्देश देते! 

कौन तुम मेरे हृदय में -महादेवी वर्मा

कौन मेरी कसक में नित,
मधुरता भरता अलक्षित?
कौन प्यासे लोचनों में,
घुमड़ घिर झरता अपरिचित?

स्वर्ण-स्वप्नों का चितेरा,
नींद के सूने निलय में!
कौन तुम मेरे हृदय में?

अनुसरण नि:श्वास मेरे,
कर रहे किसका निरन्तर?
चूमने पदचिह्न किसके,
लौटते यह श्वास फिर फिर!

कौन बन्दी कर मुझे अब,
बँध गया अपनी विजय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?

एक करूण अभाव में चिर-
तृप्ति का संसार संचित,
एक लघु क्षण दे रहा,
निर्वाण के वरदान शत शत!

पा लिया मैंने किसे इस,
वेदना के मधुर क्रय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?

गूँजता उर में न जाने
 दूर के संगीत सा क्या?
आज खो निज को मुझे
          महादेवी वर्मा 

दीपक पर पतंग-महादेवी वर्मा

दीपक में पतंग जलता क्यों?
प्रिय की आभा में जीता फिर
 दूरी का अभिनय करता क्यों
 पागल रे पतंग जलता क्यों

 उजियाला जिसका दीपक है
 मुझमें भी है वह चिनगारी
 अपनी ज्वाला देख अन्य की
 ज्वाला पर इतनी ममता क्यों

 गिरता कब दीपक दीपक में
 तारक में तारक कब घुलता
 तेरा ही उन्माद शिखा में
 जलता है फिर आकुलता क्यों

 पाता जड़ जीवन जीवन से
 तम दिन में मिल दिन हो जाता
 पर जीवन के आभा के कण
 एक सदा भ्रम मे फिरता क्यों

 जो तू जलने को पागल हो
 आँसू का जल स्नेह बनेगा
 धूमहीन निस्पंद जगत में
 जल-बुझ, यह क्रंदन करता 
दीपक में पतंग जलता क्यों?
          
                महादेवी वर्मा

  

जाग-जाग सुकेशिनी री!-महादेवी वर्मा

Mahadevi Verma: The Modern Meera | The Dispatch
जाग-जाग सुकेशिनी री!

अनिल ने आ मृदुल हौले
 शिथिल वेणी-बन्धन खोले
 पर न तेरे पलक डोले
 बिखरती अलकें, झरे जाते
 सुमन, वरवेशिनी री!

छाँह में अस्तित्व खोये
 अश्रु से सब रंग धोये
 मन्दप्रभ दीपक सँजोये,
पंथ किसका देखती तू अलस
 स्वप्न - निमेषिनी री?
Mahadevi Verma | Modern Meera of India | Prakhar Jeevan
रजत - तारों घटा बुन बुन
 गगन के चिर दाग़ गिन-गिन
 श्रान्त जग के श्वास चुन-चुन
 सो गई क्या नींद की अज्ञात-
पथ निर्देशिनी री?
Mahadevi Verma: The Modern Meera | The Dispatch

दिवस की पदचाप चंचल
 श्रान्ति में सुधि-सी मधुर चल
 आ रही है निकट प्रतिपल,
निमिष में होगा अरुण-जग
 ओ विराग-निवेशिनी री?

रूप-रेखा - उलझनों में
 कठिन सीमा - बन्धनों में
 जग बँधा निष्ठुर क्षणों में
 अश्रुमय कोमल कहाँ तू
 आ गई परदेशिनी री?
महादेवी वर्मा की कहानी बिबिया Mahadevi ...

         महादेवी वर्मा